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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 28th Jul 2024

    आँसुओं में भीगने के बा’द!

    नर्म-ओ-नाज़ुक हल्के-फुल्के रूई जैसे ख़्वाब थे, आँसुओं में भीगने के बा’द भारी हो गए| राहत इंदौरी

  • 28th Jul 2024

    अहकामात जारी हो गए!

    रख दिए जाएँगे नेज़े लफ़्ज़ और होंटों के बीच, ज़िल्ल-ए-सुब्हानी के अहकामात जारी हो गए| राहत इंदौरी

  • 28th Jul 2024

    चाँद पागल हो गया!

    रौशनी की जंग में तारीकियाँ पैदा हुईं, चाँद पागल हो गया तारे भिकारी हो गए| राहत इंदौरी

  • 28th Jul 2024

    और पुजारी हो गए!

    देवियाँ पहुँचीं थीं अपने बाल बिखराए हुए, देवता मंदिर से निकले और पुजारी हो गए| राहत इंदौरी

  • 28th Jul 2024

    बाप हाकिम था मगर!

    फ़ैसले लम्हात के नस्लों पे भारी हो गए, बाप हाकिम था मगर बेटे भिकारी हो गए| राहत इंदौरी

  • 28th Jul 2024

    श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-11

    मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज ग्यारहवां दिन है, मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ। जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी…

  • 27th Jul 2024

    दिखाई देता है जो कुछ!

    बहुत भरोसा न कर लेना अपनी आँखों पर, दिखाई देता है जो कुछ वो ख़्वाब होता है. वसीम बरेलवी

  • 27th Jul 2024

    गँवाने को कुछ नहीं होता!

    जब उस के पास गँवाने को कुछ नहीं होता, तो कोई आज का इज़्ज़त-मआब होता है. वसीम बरेलवी

  • 27th Jul 2024

    वही कामयाब होता है!

    उसे पता ही नहीं है कि प्यार की बाज़ी, जो हार जाए वही कामयाब होता है. वसीम बरेलवी

  • 27th Jul 2024

    बिछड़ के मुझ से तुम!

    बिछड़ के मुझ से तुम अपनी कशिश न खो देना, उदास रहने से चेहरा ख़राब होता है| वसीम बरेलवी

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