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दामन मिरी नज़र से!
कहने को वो हसीन थे आँखें थीं बेवफ़ा, दामन मिरी नज़र से बचा कर चले गए| हसरत जयपुरी
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मस्ती भरी नज़र से!
होश-ओ-हवास पे मिरे बिजली सी गिर पड़ी, मस्ती भरी नज़र से पिला के चले गए| हसरत जयपुरी
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ड्योढ़ी!
आज एक बार फिर मैं राजस्थान के विख्यात कवि स्वर्गीय हरीश भादानी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भादानी जी ने राजस्थानी और खड़ी बोली दोनों में अपनी श्रेष्ठ रचनाओं के माध्यम से योगदान किया है| भादानी जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय…
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हम सा कोई आवारा!
सहरा में बगूला भी है ‘मजरूह’ सबा भी, हम सा कोई आवारा-ए-आलम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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शबनम तो नहीं है!
चाहे वो किसी का हो लहू दामन-ए-गुल पर, सय्याद ये कल रात की शबनम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी