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मैं इक दिन ख़ुद ही!
मुझ को समझाओ न ‘साहिर’ मैं इक दिन ख़ुद ही, ठोकरें खा के मोहब्बत में सँभल जाऊँगा| साहिर लुधियानवी
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आह बन कर तिरे!
दर्द कहता है ये घबरा के शब-ए-फ़ुर्क़त में, आह बन कर तिरे पहलू से निकल जाऊँगा| साहिर लुधियानवी
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तेरा वा’दा तो नहीं हूँ!
मेरी तक़दीर में जलना है तो जल जाऊँगा, तेरा वा‘दा तो नहीं हूँ जो बदल जाऊँगा| साहिर लुधियानवी
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यह दौर सांप का डसा हुआ!
आज एक बार फिर मैं वाराणसी के विख्यात नवगीतकार स्वर्गीय श्रीकृष्ण तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| तिवारी जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्रीकृष्ण तिवारी जी का यह नवगीत – मीठी लगने लगी नीम की पत्ती -पत्तीलगता है यह दौर सांप…
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वहशत तेरे दीवाने में है
तू कहे तो आसमाँ की धज्जियाँ कर दूँ सनम, आज इक ऐसी ही वहशत तेरे दीवाने में है| हसरत जयपुरी
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आँखों के पैमाने में है!
मय की मस्ती तो उतर जाती है थोड़ी देर में, ज़िंदगी भर का नशा आँखों के पैमाने में है| हसरत जयपुरी
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किसकी ये तस्वीर है!
चाँदनी रातों में अक्सर सोचता रहता हूँ मैं, किसकी ये तस्वीर है जो दिल के वीराने में है| हसरत जयपुरी
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लुत्फ़ जलने में नहीं!
शम्अ‘ में ताक़त कहाँ जो एक परवाने में है, लुत्फ़ जलने में नहीं जल जल के मर जाने में है| हसरत जयपुरी