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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 27th Jul 2024

    मोहब्बतों में कब!

    कहाँ सवाब कहाँ क्या अज़ाब होता है, मोहब्बतों में कब इतना हिसाब होता है| वसीम बरेलवी

  • 27th Jul 2024

    कच्ची नींद उचट गई!

    मिरी बंद पलकों पे टूट कर कोई फूल रात बिखर गया, मुझे सिसकियों ने जगा दिया मिरी कच्ची नींद उचट गई| बशीर बद्र

  • 27th Jul 2024

    ग़म की रात कट गई!

    न कोई ख़ुशी न मलाल है कि सभी का एक सा हाल है, तिरे सुख के दिन भी गुज़र गए मिरी ग़म की रात भी कट गई| बशीर बद्र

  • 27th Jul 2024

    श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-9

    मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज नौवां दिन है, जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ। जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ,…

  • 26th Jul 2024

    मेरा नाम लिखा गया

    मुझे लिखने वाला लिखे भी क्या मुझे पढ़ने वाला पढ़े भी क्या, जहाँ मेरा नाम लिखा गया वहीं रौशनाई उलट गई| बशीर बद्र

  • 26th Jul 2024

    बदन से लिपट गई

    तिरी याद आए तो चुप रहूँ ज़रा चुप रहूँ तो ग़ज़ल कहूँ, ये ‘अजीब आग की बेल थी मिरे तन-बदन से लिपट गई| बशीर बद्र

  • 26th Jul 2024

    ये ज़मीन कितनी सिमट गई

    मिरी ज़िंदगी भी मिरी नहीं ये हज़ार ख़ानों में बट गई, मुझे एक मुट्ठी ज़मीन दे ये ज़मीन कितनी सिमट गई| बशीर बद्र

  • 26th Jul 2024

    ख़ुशी हम ग़रीबों की

    ख़ुशी हम ग़रीबों की क्या है मियाँ, मज़ारों पे चादर चढ़ाई हुई| बशीर बद्र

  • 26th Jul 2024

    बहारों की बेटी पराई

    उदासी बिछी है बड़ी दूर तक, बहारों की बेटी पराई हुई| बशीर बद्र

  • 26th Jul 2024

    ख़ूबसूरत पढ़ाई हुई

    वो चेहरा किताबी रहा सामने, बड़ी ख़ूबसूरत पढ़ाई हुई| बशीर बद्र

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