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कुछ ज़ख़्म ही खाएँ!
कुछ ज़ख़्म ही खाएँ चलो कुछ गुल ही खिलाएँ, हर-चंद बहाराँ का ये मौसम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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गो रात मिरी सुब्ह की!
गो रात मिरी सुब्ह की महरम तो नहीं है, सूरज से तिरा रंग-ए-हिना कम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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रहबर ने लूट लिया!
‘मजरूह’ क़ाफ़िले की मिरे दास्ताँ ये है, रहबर ने मिल के लूट लिया राहज़न के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी
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नए पैरहन के साथ!
दुश्मन की दोस्ती है अब अहल-ए-वतन के साथ, है अब ख़िज़ाँ चमन में नए पैरहन के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी
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नहीं जी रहे अगर!
आज एक बार फिर मैं विख्यात कवि और राजनेता श्री उदयप्रताप सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| उदयप्रताप जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री उदयप्रताप सिंह जी की यह कविता – चाहे जो हो धर्म तुम्हारा चाहे जो वादी हो ।नहीं जी…
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लोगों से सुनते हैं!
ज़ख़्म तो हम ने इन आँखों से देखे हैं, लोगों से सुनते हैं मरहम होता है| जावेद अख़्तर
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दुनिया में कम होता है!
सच ये है बे-कार हमें ग़म होता है, जो चाहा था दुनिया में कम होता है| जावेद अख़्तर