कुछ ज़ख़्म ही खाएँ!

कुछ ज़ख़्म ही खाएँ चलो कुछ गुल ही खिलाएँ,

हर-चंद बहाराँ का ये मौसम तो नहीं है|

             मजरूह सुल्तानपुरी

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