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नीली सतह पर!
आज एक बार फिर मैं पद्मभूषण जैसे उच्च नागरिक सम्मान और ज्ञानपीठ सहित अनेक साहित्यिक सम्मानों से विभूषित हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| वे अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक में भी एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में सम्मिलित थे| कुँवर नारायण जी की कुछ…
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न तो आने की ख़बर है!
किस को रोके कोई रस्ते में कहाँ बात करे, न तो आने की ख़बर है न पता जाने का| गुलज़ार
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अंदाज़ था फ़रमाने का!
मैं ने अल्फ़ाज़ तो बीजों की तरह छाँट दिए, ऐसा मीठा तिरा अंदाज़ था फ़रमाने का| गुलज़ार
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बुलबुला फिर से चला!
बुलबुला फिर से चला पानी में ग़ोते खाने, न समझने का उसे वक़्त न समझाने का| गुलज़ार
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इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है!
एक सन्नाटा दबे-पाँव गया हो जैसे, दिल से इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है बिछड़ जाने का| गुलज़ार
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मिरे अफ़्साने का!
ज़िक्र होता है जहाँ भी मिरे अफ़्साने का, एक दरवाज़ा सा खुलता है कुतुब-ख़ाने* का| *Research Library गुलज़ार
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मोआमला तो रहा!
ये और बात कि हर छेड़ ला-उबाली थी, तिरी नज़र का दिलों से मोआमला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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शब्दों की पुकार!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत जी को आपातकाल में लिखी गई उनकी ग़ज़लों के संग्रह ‘साये में धूप’ के लिए विशेष रूप से खयाती मिली थी| दुष्यंत जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ|…
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फ़ासला तो रहा!
मैं तेरी ज़ात में गुम हो सका न तू मुझ में, बहुत क़रीब थे हम फिर भी फ़ासला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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न अक़्ल हार सकी!
चलो न इश्क़ ही जीता न अक़्ल हार सकी, तमाम वक़्त मज़े का मुक़ाबला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर