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क़दम क़दम पे कोई!
गुज़र ही आए किसी तरह तेरे दीवाने, क़दम क़दम पे कोई सख़्त मरहला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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हौसला तो रहा!
तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा, ये कम नहीं हमें जीने का हौसला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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दिल में अपने दर्द की!
दिल में अपने दर्द की छिटकी हुई है चाँदनी, हर तरफ़ फैली हुई है तीरगी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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उनके वादों में हुई है!
जितने वादे कल थे उतने आज भी मौजूद हैं, उनके वादों में हुई है कुछ कमी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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चलना हमारा काम है!
आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध हिन्दी कवि स्वर्गीय शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ जी की यह कविता – गति प्रबल पैरों में भरीफिर क्यों रहूं…
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पाँव इतने तेज़ हैं!
पाँव इतने तेज़ हैं उठते नज़र आते नहीं, आज थक कर रह गया है आदमी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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सोने की ज़ंजीरें कहाँ!
कट सकी हैं आज तक सोने की ज़ंजीरें कहाँ, हम भी अब आज़ाद हैं यारो अभी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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अक़्ल के आगे है क्या!
हम से दीवानों के बिन दुनिया सँवरती किस तरह, अक़्ल के आगे है क्या दीवानगी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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गुनगुनाहट तो सुनो!
उस नज़र की उस बदन की गुनगुनाहट तो सुनो, एक सी होती है हर इक रागनी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर
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जिस्म की हर बात है!
जिस्म की हर बात है आवारगी ये मत कहो, हम भी कर सकते हैं ऐसी शायरी ये मत कहो| जाँ निसार अख़्तर