कट सकी हैं आज तक सोने की ज़ंजीरें कहाँ,
हम भी अब आज़ाद हैं यारो अभी ये मत कहो|
जाँ निसार अख़्तर
A sky full of cotton beads like clouds
कट सकी हैं आज तक सोने की ज़ंजीरें कहाँ,
हम भी अब आज़ाद हैं यारो अभी ये मत कहो|
जाँ निसार अख़्तर
लोहे की ज़ंजीरें तो काट सकते हो, लेकिन सोने की काटना कठिन है पर असंभव भी नहीं। बुद्ध ने काटी है, ओशो ने काटी है। जिस अहंकार को हमने सजा लिया है वह सोने की ज़ंजीर हो गई। हमने ही सजाया है इसीलिए उससे मुक्त होना और ज़्यादा कठिन हो जाता है, लेकिन कटतीं ज़रूर हैं। क्योंकि मौत उसी की होगी जिसने जन्म लिया था, और इसलिए मौत को ज़ंजीर काटना पड़ती है और इसलिए कई कोमा में चले जाते हैं। और जीवन नष्ट हो जाता है, लेकिन हम समय रहते प्रयत्न तो कर ही सकते हैं, ताकि मौत में हम होंशपूर्वक आख़री सांस छोड़ सकें, बस यही मोक्ष है। एक सिंहासन चढ़ी चले इसी मौत के बारे में कहा गया है।
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