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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 21st Jul 2024

    ख़ामुशी अच्छी नहीं!

    ख़ामुशी अच्छी नहीं इंकार होना चाहिए, ये तमाशा अब सर-ए-बाज़ार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल

  • 21st Jul 2024

    श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-3

    मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज तीसरा दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी…

  • 20th Jul 2024

    और अभी हम कब तलक!

    ऐ रुख़-ए-ज़ेबा बता दे और अभी हम कब तलक, तीरगी को शम-ए-तन्हाई को परवाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 20th Jul 2024

    दिल को वीराना कहें!

    पारा-ए-दिल है वतन की सरज़मीं मुश्किल ये है, शहर को वीरान या इस दिल को वीराना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 20th Jul 2024

    किसको पैमाना कहें!

    तिश्नगी ही तिश्नगी है किस को कहिए मय-कदा, लब ही लब हम ने तो देखे किस को पैमाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 20th Jul 2024

    छू लिए साक़ी के होंट!

    सुर्ख़ी-ए-मय कम थी मैं ने छू लिए साक़ी के होंट, सर झुका है जो भी अब अरबाब-ए-मय-ख़ाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 20th Jul 2024

    अंदाज़-ए-रिंदाना कहें!

    थामें उस बुत की कलाई और कहें इस को जुनूँ, चूम लें मुँह और इसे अंदाज़-ए-रिंदाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 20th Jul 2024

    ज़िंदगी को दिल कहें!

    यार-ए-नुक्ता-दाँ किधर है फिर चलें उस के हुज़ूर, ज़िंदगी को दिल कहें और दिल को नज़राना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 20th Jul 2024

    चाहे दीवाना कहें!

    दार पर चढ़ कर लगाएँ नारा-ए-ज़ुल्फ़-ए-सनम, सब हमें बाहोश समझें चाहे दीवाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 20th Jul 2024

    अहल-ए-तूफ़ाँ आओ!

    अहल-ए-तूफ़ाँ आओ दिल-वालों का अफ़्साना कहें, मौज को गेसू भँवर को चश्म-ए-जानाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी

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