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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th Jan 2024

    कहते रहें मर जाएँगे!

    नेमत-ए-ज़ीस्त का ये क़र्ज़ चुकेगा कैसे, लाख घबरा के ये कहते रहें मर जाएँगे|             फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 12th Jan 2024

    हम तिरी याद से!

    किस क़दर होगा यहाँ मेहर-ओ-वफ़ा का मातम, हम तिरी याद से जिस रोज़ उतर जाएँगे|              फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 12th Jan 2024

    हम मुसाफ़िर यूँही!

    हम मुसाफ़िर यूँही मसरूफ़-ए-सफ़र जाएँगे, बे-निशाँ हो गए जब शहर तो घर जाएँगे|             फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 12th Jan 2024

    ख़िज़ाँ का शुक्र करो!

    बाद-ए-ख़िज़ाँ का शुक्र करो ‘फ़ैज़’ जिस के हाथ, नामे किसी बहार-ए-शिमाइल से आए हैं|              फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 12th Jan 2024

    हर इक गाम ज़िंदगी!

    हर इक क़दम अजल था हर इक गाम ज़िंदगी, हम घूम फिर के कूचा-ए-क़ातिल से आए हैं|                फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 12th Jan 2024

    किस दिल से आए हैं!

    उठ कर तो आ गए हैं तिरी बज़्म से मगर, कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आए हैं|                 फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 12th Jan 2024

    जितने चराग़ हैं!

    शम-ए-नज़र ख़याल के अंजुम जिगर के दाग़, जितने चराग़ हैं तिरी महफ़िल से आए हैं|               फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 12th Jan 2024

    सब क़त्ल हो के तेरे!

    सब क़त्ल हो के तेरे मुक़ाबिल से आए हैं, हम लोग सुर्ख़-रू हैं कि मंज़िल से आए हैं|             फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 12th Jan 2024

    वह आया!

    आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध राष्ट्रीय कवि स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| द्विवेदी जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की, गांधी जी के विराट व्यक्तित्व पर केंद्रित यह कविता – मन में नूतन बल सँवारताजीवन…

  • 11th Jan 2024

    परिंद अपने परों का!

    फ़ज़ा-ए-शौक़ में उस की बिसात ही क्या थी, परिंद अपने परों का निशाना हो गया है|             इरफ़ान सिद्दीक़ी

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