हम मुसाफ़िर यूँही!

हम मुसाफ़िर यूँही मसरूफ़-ए-सफ़र जाएँगे,

बे-निशाँ हो गए जब शहर तो घर जाएँगे|

            फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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