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क्या किया आज तक क्या पाया!
आज पहली बार मैं हिन्दी के प्रमुख व्यंग्यकार स्वर्गीय हरिशंकर परसाई जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| परसाई जी ने शायद कुछ ही कविताएं लिखी हैं, जिनमें से एक मैं शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिशंकर परसाई जी की यह कविता – मैं सोच रहा, सिर पर अपारदिन, मास,…
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गुमनाम से पहले पहले!
कितना अच्छा था कि हम भी जिया करते थे ‘फ़राज़’, ग़ैर-मारूफ़ से गुमनाम से पहले पहले|
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तिरे नाम से पहले पहले
अब तिरे ज़िक्र पे हम बात बदल देते हैं, कितनी रग़बत थी तिरे नाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़
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अंजाम से पहले पहले!
ख़ुश हो ऐ दिल कि मोहब्बत तो निभा दी तूने, लोग उजड़ जाते हैं अंजाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़
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मेरी मूक पुकार!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले अपने समय के प्रमुख कवि स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय…