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हँसती हुई निगाह भी
कुछ इस तरह से वक़्त ने लीं करवटें ‘असद’, हँसती हुई निगाह भी मग़्मूम हो गई| असद भोपाली
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ख़ुलूस ओ दर्द से
क़ल्ब ओ ज़मीर बे-हिस ओ बे-जान हो गए, दुनिया ख़ुलूस ओ दर्द से महरूम हो गई| असद भोपाली
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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-16
मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज सोलहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ। जैसा मैंने पहले…
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अब ज़िंदगी से ज़िंदगी!
हालात ने किसी से जुदा कर दिया मुझे, अब ज़िंदगी से ज़िंदगी महरूम हो गई| असद भोपाली
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ये सज्दे कहीं और!
इक आप का दर है मिरी दुनिया-ए-अक़ीदत, ये सज्दे कहीं और अदा हो नहीं सकते| असद भोपाली