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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Aug 2024

    तमाम रात थी और

    तमाम रात थी और कुहनीयाँ ओ लातें थीं, न सोने देता था मुझ को न आप सोता था. नज़ीर अकबराबादी

  • 2nd Aug 2024

    लिपट लिपट के मैं

    लिपट लिपट के मैं उस गुल के साथ सोता था, रक़ीब सुब्ह को मुँह आँसुओं से धोता था. नज़ीर अकबराबादी

  • 2nd Aug 2024

    हँसती हुई निगाह भी

    कुछ इस तरह से वक़्त ने लीं करवटें ‘असद’, हँसती हुई निगाह भी मग़्मूम हो गई| असद भोपाली

  • 2nd Aug 2024

    उन की नज़र के कोई

    उन की नज़र के कोई इशारे न पा सका, मेरे जुनूँ की चारों तरफ़ धूम हो गई| असद भोपाली

  • 2nd Aug 2024

    ख़ुलूस ओ दर्द से

    क़ल्ब ओ ज़मीर बे-हिस ओ बे-जान हो गए, दुनिया ख़ुलूस ओ दर्द से महरूम हो गई| असद भोपाली

  • 2nd Aug 2024

    श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-16

    मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज सोलहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ। जैसा मैंने पहले…

  • 1st Aug 2024

    अब ज़िंदगी से ज़िंदगी!

    हालात ने किसी से जुदा कर दिया मुझे, अब ज़िंदगी से ज़िंदगी महरूम हो गई| असद भोपाली

  • 1st Aug 2024

    जब ज़िंदगी सुकून से!

    जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो गई, उन की निगाह और भी मासूम हो गई| असद भोपाली

  • 1st Aug 2024

    ये ज़हर भरे घूँट!

    अहबाब पे दीवाने ‘असद’ कैसा भरोसा, ये ज़हर भरे घूँट रवा हो नहीं सकते| असद भोपाली

  • 1st Aug 2024

    ये सज्दे कहीं और!

    इक आप का दर है मिरी दुनिया-ए-अक़ीदत, ये सज्दे कहीं और अदा हो नहीं सकते| असद भोपाली

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