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गठरी खोल दी हमने!
फ़रिश्तो तुम कहाँ तक नामा-ए-आमाल देखोगे, चलो ये नेकियाँ गिन लो कि गठरी खोल दी हमने| मुनव्वर राना
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रस्सी खोल दी हमने!
कहाँ तक बोझ बैसाखी का सारी ज़िंदगी ढोते, उतरते ही कुएँ में आज रस्सी खोल दी हमने| मुनव्वर राना
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जो मुट्ठी खोल दी हमने!
पड़ा रहने दो अपने बोरिए पर हम फ़क़ीरों को, फटी रह जाएँगी आँखें जो मुट्ठी खोल दी हमने| मुनव्वर राना
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अब तो हम को भी वो!
हम दिया करते थे अग़्यार को ता‘ना जिनका, अब तो हम को भी वो आदाब-ए-वफ़ा याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
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हादिसा कब ये हुआ!
एक वा‘दा था जो शीशे की तरह टूट गया, हादिसा कब ये हुआ कैसे हुआ याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
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फिर ख़यालों में वो!
फिर ख़यालों में वो बीते हुए सावन आए, लेकिन अब तुझ को पपीहे की सदा याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
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झर पड़ता जीवन-डाली से!
आज मैं छायावाद काल के एक प्रमुख स्तंभ, प्रकृति के चितेरे कवि स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| पंत जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता – झर पड़ता जीवन-डाली सेमैं पतझड़ का-सा जीर्ण-पात!–केवल, केवल जग-कानन…
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राह-नुमा याद नहीं!
रास्ते याद नहीं राह-नुमा याद नहीं, अब मुझे कुछ तिरी गलियों के सिवा याद नहीं| क़तील शिफ़ाई
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बने हैं दाएरे क्या क्या!
‘क़तील’ ज़ख़्म सहूँ और मुस्कुराता रहूँ, बने हैं दाएरे क्या क्या मिरे अमल के लिए| क़तील शिफ़ाई