-
जितने भी बदनाम हुए!
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया, जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया| जाँ निसार अख़्तर
-
कोई सूरज मिरे!
लम्हा लम्हा रहे आँखों में अँधेरे लेकिन, कोई सूरज मिरे सीने में उभरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
-
मिट गया पर तिरी!
मिट गया पर तिरी बाँहों ने समेटा न मुझे, शहर दर शहर मैं गलियों में बिखरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
-
कोई साया मिरे!
रास्ते भर कोई आहट थी कि आती ही रही, कोई साया मिरे बाज़ू से गुज़रता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
-
चाँद उतरता ही रहा!
रौशनी कम न हुई वक़्त के तूफ़ानों में, दिल के दरिया में कोई चाँद उतरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
-
कोई सँवरता ही रहा!
दीदा ओ दिल में कोई हुस्न बिखरता ही रहा, लाख पर्दों में छुपा कोई सँवरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
-
श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-21
मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज इक्कीसवां और फिलहाल अंतिम दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध थीं, एक साथ शेयर करने की कोशिश की है|जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, लेकिन अब जबकि…
-
कमी की तरफ़ नहीं देखा!
जो आइने से मिला आइने पे झुँझलाया, किसी ने अपनी कमी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली
-
तमाम ‘उम्र गुज़ारी!
तमाम ‘उम्र गुज़ारी ख़याल में जिस के, तमाम ‘उम्र उसी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली