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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 10th Aug 2024

    अब आएँ या न आएँ!

    अब आएँ या न आएँ इधर पूछते चलो, क्या चाहती है उन की नज़र पूछते चलो| साहिर लुधियानवी

  • 10th Aug 2024

    कुर्सी लगा के!

    जो मेरे वास्ते कुर्सी लगाया करता था, वो मेरी कुर्सी से कुर्सी लगा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 10th Aug 2024

    ये मेरा दिल है कि!

    तुम्हारे दर से मैं कब उठना चाहता था मगर, ये मेरा दिल है कि मुझ को उठा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 10th Aug 2024

    मेरी एक और कविता!

    आज फिर से पुराना लिखा हुआ कुछ याद आ रहा है, रचना ही कहूँगा इसे भी| जैसा याद आ रहा है, अपनी रचनाओं को शेयर करने के क्रम में इसे भी, जैसा है वैसा ही प्रस्तुत कर रहा हूँ- गीत जो लिखे गए, लिखे गए। किसी एक शर बिंधे, रंगे खग की आकुल चेष्टाओं की…

  • 9th Aug 2024

    दरख़्त काट के जब!

    दरख़्त काट के जब थक गया लकड़-हारा, तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 9th Aug 2024

    वो पास क्या ज़रा सा!

    वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया, मैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 9th Aug 2024

    और फिर वो ही!

    एक ही बार नज़र पड़ती है उन पर ‘ताबिश’, और फिर वो ही लगातार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 9th Aug 2024

    ज़ख़्म भरने लगे हैं!

    ज़ख़्म भरने लगे हैं पिछली मुलाक़ातों के, फिर मुलाक़ात के आसार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 9th Aug 2024

    हर तरफ़ उसके!

    मैं कहाँ जाऊँ करूँ किस से शिकायत उस की, हर तरफ़ उस के तरफ़-दार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 9th Aug 2024

    आप तो ख़ैर!

    कोई पागल ही मोहब्बत से नवाज़ेगा मुझे, आप तो ख़ैर समझदार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश

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