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कुर्सी लगा के!
जो मेरे वास्ते कुर्सी लगाया करता था, वो मेरी कुर्सी से कुर्सी लगा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश
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ये मेरा दिल है कि!
तुम्हारे दर से मैं कब उठना चाहता था मगर, ये मेरा दिल है कि मुझ को उठा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश
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मेरी एक और कविता!
आज फिर से पुराना लिखा हुआ कुछ याद आ रहा है, रचना ही कहूँगा इसे भी| जैसा याद आ रहा है, अपनी रचनाओं को शेयर करने के क्रम में इसे भी, जैसा है वैसा ही प्रस्तुत कर रहा हूँ- गीत जो लिखे गए, लिखे गए। किसी एक शर बिंधे, रंगे खग की आकुल चेष्टाओं की…
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दरख़्त काट के जब!
दरख़्त काट के जब थक गया लकड़-हारा, तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश
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वो पास क्या ज़रा सा!
वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया, मैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश
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और फिर वो ही!
एक ही बार नज़र पड़ती है उन पर ‘ताबिश’, और फिर वो ही लगातार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश
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ज़ख़्म भरने लगे हैं!
ज़ख़्म भरने लगे हैं पिछली मुलाक़ातों के, फिर मुलाक़ात के आसार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश
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हर तरफ़ उसके!
मैं कहाँ जाऊँ करूँ किस से शिकायत उस की, हर तरफ़ उस के तरफ़-दार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश