तू भी तमाम है चाँद!

अपने दिल के मश्रिक-ओ-मग़रिब उस के रुख़ से मुनव्वर हैं,

बे-शक तेरा रूप भी कामिल बे-शक तू भी तमाम है चाँद|

                  इब्न-ए-इंशा

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