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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Aug 2024

    बदल गया मौसम!

    सफ़र के बीच ये कैसा बदल गया मौसम, कि फिर किसी ने किसी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 6th Aug 2024

    अना ने किसी की!

    कचोके देती रहीं ग़ुर्बतें मुझे लेकिन, मिरी अना ने किसी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 6th Aug 2024

    किसी ने मुड़ के!

    क़लक़ था सब को समुंदर की बे-क़रारी का, किसी ने मुड़ के नदी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 6th Aug 2024

    जिसे तलब थी!

    सहर ने अंधी गली की तरफ़ नहीं देखा, जिसे तलब थी उसी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 6th Aug 2024

    श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-20

    मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज बीसवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ। जैसा मैंने पहले…

  • 5th Aug 2024

    पढ़ने वाला कम-नज़र!

    ‘कैफ़’ में हूँ एक नूरानी किताब, पढ़ने वाला कम-नज़र है क्या करूँ. कैफ़ भोपाली

  • 5th Aug 2024

    वो नज़र फिर वो!

    ‘कैफ़’ का दिल ‘कैफ़’ का दिल है मगर, वो नज़र फिर वो नज़र है क्या करूँ, कैफ़ भोपाली

  • 5th Aug 2024

    पाँव में ज़ंजीर काँटे!

    पाँव में ज़ंजीर काँटे आबले, और फिर हुक्म-ए-सफ़र है क्या करूँ. कैफ़ भोपाली

  • 5th Aug 2024

    वो तो सौ सौ मर्तबा!

    वो तो सौ सौ मर्तबा चाहें मुझे, मेरी चाहत में कसर है क्या करूँ. कैफ़ भोपाली

  • 5th Aug 2024

    फूँक दूँ इस शहर को!

    चाहता हूँ फूँक दूँ इस शहर को, शहर में इन का भी घर है क्या करूँ. कैफ़ भोपाली

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