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भीगी शाम है चाँद!
हम से भी दो बातें कर ले कैसी भीगी शाम है चाँद, सब कुछ सुन ले आप न बोले तेरा ख़ूब निज़ाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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रजनीगन्धा खिले पराए आँगन में!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| किशन सरोज जी ने अपने गीतों में प्रेम के सुकोमल भावों को बड़ी महारत के साथ अभिव्यक्त किया है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज का यह गीत– मन की सीमा के…
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बदनाम है चाँद!
वो जो तेरा दाग़ ग़ुलामी माथे पर लिए फिरता है, उसका नाम तो ‘इंशा’ ठहरा नाहक़ को बदनाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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कहाँ कलाम है चाँद!
सखियों से कब सखियाँ अपने जी के भेद छुपाती हैं, हम से नहीं तो उस से कह दे करता कहाँ कलाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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तू भी हरे दरीचे वाली!
तू भी हरे दरीचे वाली आ जा बर-सर-ए-बाम है चाँद, हर कोई जग में ख़ुद सा ढूँडे तुझ बिन बसे आराम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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वहशत का पैग़ाम है!
ऐ दिल वालो घर से निकलो देता दावत-ए-आम है चाँद, शहरों शहरों क़रियों क़रियों वहशत का पैग़ाम है चाँद| इब्न-ए-इंशा
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चिट्ठी खोल दी हमने!
तुम्हारे दुख उठाए इसलिए फिरते हैं मुद्दत से, तुम्हारे नाम आई थी जो चिट्ठी खोल दी हमने| मुनव्वर राना
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प्रगल्भ प्रेम!
आज मैं छायावाद काल के एक प्रमुख स्तंभ, और हिन्दी के अनूठे कवि स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| निराला जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की यह कविता – आज नहीं है मुझे और कुछ…
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पट्टी खोल दी हमने!
पुराने हो चले थे ज़ख़्म सारे आरज़ूओं के, कहो चारागरों से आज पट्टी खोल दी हमने| मुनव्वर राना
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खिड़की खोल दी हमने
तुम्हारा नाम आया और हम तकने लगे रस्ता, तुम्हारी याद आई और खिड़की खोल दी हमने| मुनव्वर राना