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झोंका बहाना हो गया है
हमें तो ख़ैर बिखरना ही था कभी न कभी, हवा-ए-ताज़ा का झोंका बहाना हो गया है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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जल रहे हैं सदियों से!
कहाँ है तू कि यहाँ जल रहे हैं सदियों से, चराग़ दीदा ओ मेहराब देखने के लिए| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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मेरे ही साथ डूब गया!
अजब हरीफ़ था मेरे ही साथ डूब गया, मिरे सफ़ीने को ग़र्क़ाब देखने के लिए| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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कि नींद शर्त नहीं!
उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए, कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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नई बात क्या करें!
शायद तुम्हारे आने से ये भेद खुल सके, हैरान हैं कि आज नई बात क्या करें| साहिर लुधियानवी
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साँसों में घुल रही है!
साँसों में घुल रही है किसी साँस की महक, दामन को छू रहा है कोई हात क्या करें| साहिर लुधियानवी
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महंगाई!
आज एक बार फिर मैं अपने समय के प्रसिद्ध हास्य कवि स्वर्गीय काका हाथरसी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| काका जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय काका हाथरसी जी की यह कविता – जन-गण मन के देवता, अब तो आँखें खोलमहँगाई से…
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ख़यालात क्या करें!
पेड़ों के बाज़ुओं में महकती है चाँदनी, बेचैन हो रहे हैं ख़यालात क्या करें| साहिर लुधियानवी
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जज़्बात क्या करें!
इतनी हसीन इतनी जवाँ रात क्या करें, जागे हैं कुछ अजीब से जज़्बात क्या करें| साहिर लुधियानवी
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मैं इक दिन ख़ुद ही!
मुझ को समझाओ न ‘साहिर’ मैं इक दिन ख़ुद ही, ठोकरें खा के मोहब्बत में सँभल जाऊँगा| साहिर लुधियानवी