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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th Jan 2024

    झोंका बहाना हो गया है

    हमें तो ख़ैर बिखरना ही था कभी न कभी, हवा-ए-ताज़ा का झोंका बहाना हो गया है|              इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 11th Jan 2024

    जल रहे हैं सदियों से!

    कहाँ है तू कि यहाँ जल रहे हैं सदियों से, चराग़ दीदा ओ मेहराब देखने के लिए|             इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 11th Jan 2024

    मेरे ही साथ डूब गया!

    अजब हरीफ़ था मेरे ही साथ डूब गया, मिरे सफ़ीने को ग़र्क़ाब देखने के लिए|            इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 11th Jan 2024

    कि नींद शर्त नहीं!

    उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए, कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए|             इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 11th Jan 2024

    नई बात क्या करें!

    शायद तुम्हारे आने से ये भेद खुल सके, हैरान हैं कि आज नई बात क्या करें|               साहिर लुधियानवी  

  • 11th Jan 2024

    साँसों में घुल रही है!

    साँसों में घुल रही है किसी साँस की महक, दामन को छू रहा है कोई हात क्या करें|              साहिर लुधियानवी

  • 11th Jan 2024

    महंगाई!

    आज एक बार फिर मैं अपने समय के प्रसिद्ध हास्य कवि स्वर्गीय काका हाथरसी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| काका जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय काका हाथरसी जी की यह कविता – जन-गण मन के देवता, अब तो आँखें खोलमहँगाई से…

  • 10th Jan 2024

    ख़यालात क्या करें!

    पेड़ों के बाज़ुओं में महकती है चाँदनी, बेचैन हो रहे हैं ख़यालात क्या करें|            साहिर लुधियानवी

  • 10th Jan 2024

    जज़्बात क्या करें!

    इतनी हसीन इतनी जवाँ रात क्या करें, जागे हैं कुछ अजीब से जज़्बात क्या करें|             साहिर लुधियानवी

  • 10th Jan 2024

    मैं इक दिन ख़ुद ही!

    मुझ को समझाओ न ‘साहिर’ मैं इक दिन ख़ुद ही, ठोकरें खा के मोहब्बत में सँभल जाऊँगा|             साहिर लुधियानवी

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