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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-14
मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज चौदहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा । इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ। जैसा मैंने…
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पुराने शहर के लोगों में!
पुराने शहर के लोगों में इक रस्म-ए-मुरव्वत है, हमारे पास आ जाओ कभी धोका नहीं होगा| मुनव्वर राना
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ये बेमौसम का फल है!
हमारी दोस्ती के बीच ख़ुद-ग़र्ज़ी भी शामिल है, ये बे-मौसम का फल है ये बहुत मीठा नहीं होगा| मुनव्वर राना
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तिरे एहसास की ईंटें!
तिरे एहसास की ईंटें लगी हैं इस इमारत में, हमारा घर तिरे घर से कभी ऊँचा नहीं होगा| मुनव्वर राना
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ये ख़ून-ए-मुफ़्लिस है!
शेयर-बाज़ार में क़ीमत उछलती गिरती रहती है, मगर ये ख़ून-ए-मुफ़्लिस है कभी महँगा नहीं होगा| मुनव्वर राना
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ये दरवेशों की बस्ती है
ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा, लिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा| मुनव्वर राना
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मैं उम्र की चौखट पे!
तू ने जो सज़ा दी थी जवानी के दिनों में, मैं उम्र की चौखट पे खड़ा काट रहा हूँ| मुनव्वर राना
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लेकिन मैं इशारे से!
अब आप की मर्ज़ी है इसे जो भी समझिए, लेकिन मैं इशारे से हवा काट रहा हूँ| मुनव्वर राना