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आस्तीं पे लहू नहीं!
कहीं चाक-ए-जाँ का रफ़ू नहीं किसी आस्तीं पे लहू नहीं, कि शहीद-ए-राह-ए-मलाल का नहीं ख़ूँ-बहा उसे भूल जा| अमजद इस्लाम अमजद
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मुस्कुरा उसे भूल जा!
किसी आँख में नहीं अश्क-ए-ग़म तिरे बअ‘द कुछ भी नहीं है कम, तुझे ज़िंदगी ने भुला दिया तू भी मुस्कुरा उसे भूल जा| अमजद इस्लाम अमजद
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तिरी आस तेरे गुमान में
मैं तो गुम था तेरे ही ध्यान में तिरी आस तेरे गुमान में, सबा कह गई मिरे कान में मिरे साथ आ उसे भूल जा| अमजद इस्लाम अमजद
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भूल जा उसे भूल जा!
वो तिरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं, दिल-ए-बे-ख़बर मिरी बात सुन उसे भूल जा उसे भूल जा| अमजद इस्लाम अमजद
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असमंजस!
आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी के वरिष्ठ कवि स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की एक कविता पूर्व प्रधान मंत्री वाजपेयी जी अक्सर दोहराते थे- ‘हार में न जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं, संघर्ष पथ में जो मिला, यह भी सही वह भी सही’|…
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नहीं मिला उसे भूल जा
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा, वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा| अमजद इस्लाम अमजद
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इतना अंधेरा कैसे!
ज़ुल्फ़ें चेहरे से हटा लो कि हटा दूँ मैं ख़ुद, ‘नूर’ के होते हुए इतना अंधेरा कैसे| कृष्ण बिहारी नूर
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लिखूँ तेरा सरापा कैसे!
आँख जिस जा पे भी पड़ती है ठहर जाती है, लिखना चाहूँ तो लिखूँ तेरा सरापा कैसे| कृष्ण बिहारी नूर
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तेरी राहों में मिरे!
इस जनम में तो कभी मैं न उधर से गुज़रा, तेरी राहों में मिरे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा कैसे| कृष्ण बिहारी नूर
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बज़्म में तन्हा कैसे!
आप भी अहल-ए-ख़िरद* अहल-ए-जुनूँ** थे मौजूद, लुट गए हम भी तिरी बज़्म में तन्हा कैसे| *बुद्धिमत्ता, **जोश कृष्ण बिहारी नूर