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जाने किधर गया वो!
वो रात का बे-नवा मुसाफ़िर वो तेरा शाइर वो तेरा ‘नासिर’, तिरी गली तक तो हम ने देखा था फिर न जाने किधर गया वो| नासिर काज़मी
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सर झुकाए गुज़र गया
वो जिस के शाने पे हाथ रख कर सफ़र किया तू ने मंज़िलों का, तिरी गली से न जाने क्यूँ आज सर झुकाए गुज़र गया वो| नासिर काज़मी
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कल रात मर गया वो!
वो हिज्र की रात का सितारा वो हम-नफ़स हम-सुख़न हमारा, सदा रहे उस का नाम प्यारा सुना है कल रात मर गया वो| नासिर काज़मी
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क्यूँ बे-असर गया वो!
मिरा तू ख़ूँ हो गया है पानी सितमगरों की पलक न भीगी, जो नाला उट्ठा था रात दिल से न जाने क्यूँ बे-असर गया वो| नासिर काज़मी
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गए दिनों को बुला रहा
शिकस्ता-पा राह में खड़ा हूँ गए दिनों को बुला रहा हूँ, जो क़ाफ़िला मेरा हम-सफ़र था मिसाल-ए-गर्द-ए-सफ़र गया वो| नासिर काज़मी
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झूम रहीं बालियां!
आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| अशोक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता – रे देखो खेतों में झूम…
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ठहर गया वो!
बस एक मंज़िल है बुल-हवस की हज़ार रस्ते हैं अहल-ए-दिल के, यही तो है फ़र्क़ मुझ में उस में गुज़र गया मैं ठहर गया वो| नासिर काज़मी
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सँभलने लगी है जाँ भी!
कुछ अब सँभलने लगी है जाँ भी बदल चला दौर-ए-आसमाँ भी, जो रात भारी थी टल गई है जो दिन कड़ा था गुज़र गया वो| नासिर काज़मी
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जो ज़ख़्म गहरा था!
न अब वो यादों का चढ़ता दरिया न फ़ुर्सतों की उदास बरखा, यूँही ज़रा सी कसक है दिल में जो ज़ख़्म गहरा था भर गया वो| नासिर काज़मी