जो ज़ख़्म गहरा था!

न अब वो यादों का चढ़ता दरिया न फ़ुर्सतों की उदास बरखा,

यूँही ज़रा सी कसक है दिल में जो ज़ख़्म गहरा था भर गया वो|

                    नासिर काज़मी  

Leave a comment