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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 27th Aug 2024

    राहत-ए-जाँ ठहरी है!

    आज तक शैख़ के इकराम में जो शय थी हराम, अब वही दुश्मन-ए-दीं राहत-ए-जाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 27th Aug 2024

    जो भी चल निकली है!

    अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सब की ज़बाँ ठहरी है, जो भी चल निकली है वो बात कहाँ ठहरी है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 27th Aug 2024

    कौन क़ातिल बचा है!

    कौन क़ातिल बचा है शहर में ‘फ़ैज़’, जिस से यारों ने रस्म-ओ-राह न की| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 27th Aug 2024

    सपने!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के अप्रतिम हस्ताक्षर स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत – पँखों भर आकाश बाँध करसपने ! बहुत बड़े हो जाते…

  • 26th Aug 2024

    हम ने फ़िक्र-ए-दिल!

    थे शब-ए-हिज्र काम और बहुत, हम ने फ़िक्र-ए-दिल-ए-तबाह न की| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 26th Aug 2024

    दिल ही काफ़िर था!

    तेरे दस्त-ए-सितम का इज्ज़ नहीं, दिल ही काफ़िर था जिस ने आह न की| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 26th Aug 2024

    तुझको चाहा तो और!

    तुझ को देखा तो सेर-चश्म हुए, तुझ को चाहा तो और चाह न की| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 26th Aug 2024

    शुक्र है ज़िंदगी!

    शैख़ साहब से रस्म-ओ-राह न की, शुक्र है ज़िंदगी तबाह न की| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 26th Aug 2024

    ये दौर किस तरह से!

    ये दौर किस तरह से कटेगा पहाड़ सा, यारो बताओ हम में कोई कोहकन* भी है| *पर्वत खोदने वाला जाँ निसार अख़्तर

  • 26th Aug 2024

    सिर्फ़ रंग-ओ-बू नहीं!

    बाज़ू छुआ जो तू ने तो उस दिन खुला ये राज़, तू सिर्फ़ रंग-ओ-बू ही नहीं है बदन भी है| जाँ निसार अख़्तर

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