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ज़ुल्म मेरे नाम पर उसने किया!
शहर को बरबाद करके रख दिया उसने ‘मुनीर’, शहर पर ये ज़ुल्म मेरे नाम पर उसने किया| मुनीर नियाज़ी
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शहर में ना-मो’तबर उसने किया!
शहर में वो मो’तबर मेरी गवाही से हुआ, फिर मुझे इस शहर में ना-मो’तबर उसने किया| मुनीर नियाज़ी
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राहबर बना गुमराह करने के लिए!
राहबर मेरा बना गुमराह करने के लिए, मुझको सीधे रास्ते से दर-ब-दर उसने किया| मुनीर नियाज़ी
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मगर उसको बसर उसने किया!
मेरी सारी ज़िंदगी को बे-समर उसने किया, उम्र मेरी थी मगर उसको बसर उसने किया| मुनीर नियाज़ी
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दरिया के पार उतरा तो मैं ने देखा!
इक और दरिया का सामना था ‘मुनीर’ मुझको, मैं एक दरिया के पार उतरा तो मैं ने देखा| मुनीर नियाज़ी
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जब ख़ुमार उतरा तो मैं ने देखा!
ख़ुमार-ए-मय में वो चेहरा कुछ और लग रहा था, दम-ए-सहर जब ख़ुमार उतरा तो मैं ने देखा| मुनीर नियाज़ी
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तमाम मंज़र बदल गए थे!
गली के बाहर तमाम मंज़र बदल गए थे, जो साया-ए-कू-ए-यार उतरा तो मैं ने देखा| मुनीर नियाज़ी
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वो हुस्न-ज़ार उतरा तो मैंने देखा!
मैं नीम-शब आसमाँ की वुसअ’त को देखता था, ज़मीं पे वो हुस्न-ज़ार उतरा तो मैंने देखा| मुनीर नियाज़ी
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रंग-ए-बहार उतरा तो मैंने देखा!
चमन मैं रंग-ए-बहार उतरा तो मैंने देखा, नज़र से दिल का ग़ुबार उतरा तो मैंने देखा| मुनीर नियाज़ी
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स्वप्न के तिमिरासन्न मार्ग पर – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…