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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Feb 2023

    ज़ुल्म मेरे नाम पर उसने किया!

    शहर को बरबाद करके रख दिया उसने ‘मुनीर’, शहर पर ये ज़ुल्म मेरे नाम पर उसने किया| मुनीर नियाज़ी

  • 2nd Feb 2023

    शहर में ना-मो’तबर उसने किया!

    शहर में वो मो’तबर मेरी गवाही से हुआ, फिर मुझे इस शहर में ना-मो’तबर उसने किया| मुनीर नियाज़ी

  • 2nd Feb 2023

    राहबर बना गुमराह करने के लिए!

    राहबर मेरा बना गुमराह करने के लिए, मुझको सीधे रास्ते से दर-ब-दर उसने किया| मुनीर नियाज़ी

  • 2nd Feb 2023

    मगर उसको बसर उसने किया!

    मेरी सारी ज़िंदगी को बे-समर उसने किया, उम्र मेरी थी मगर उसको बसर उसने किया| मुनीर नियाज़ी

  • 2nd Feb 2023

    दरिया के पार उतरा तो मैं ने देखा!

    इक और दरिया का सामना था ‘मुनीर’ मुझको, मैं एक दरिया के पार उतरा तो मैं ने देखा| मुनीर नियाज़ी

  • 2nd Feb 2023

    जब ख़ुमार उतरा तो मैं ने देखा!

    ख़ुमार-ए-मय में वो चेहरा कुछ और लग रहा था, दम-ए-सहर जब ख़ुमार उतरा तो मैं ने देखा| मुनीर नियाज़ी

  • 2nd Feb 2023

    तमाम मंज़र बदल गए थे!

    गली के बाहर तमाम मंज़र बदल गए थे, जो साया-ए-कू-ए-यार उतरा तो मैं ने देखा| मुनीर नियाज़ी

  • 2nd Feb 2023

    वो हुस्न-ज़ार उतरा तो मैंने देखा!

    मैं नीम-शब आसमाँ की वुसअ’त को देखता था, ज़मीं पे वो हुस्न-ज़ार उतरा तो मैंने देखा| मुनीर नियाज़ी

  • 2nd Feb 2023

    रंग-ए-बहार उतरा तो मैंने देखा!

    चमन मैं रंग-ए-बहार उतरा तो मैंने देखा, नज़र से दिल का ग़ुबार उतरा तो मैंने देखा| मुनीर नियाज़ी

  • 2nd Feb 2023

    स्वप्न के तिमिरासन्न मार्ग पर – रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…

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