-
कैसे मिलाता है मुझे!
तेरा मुंकिर नहीं ऐ वक़्त मगर देखना है, बिछड़े लोगों से कहाँ कैसे मिलाता है मुझे| शहरयार
-
हौल सा आता है मुझे!
मेरी इन आँखों को ख़्वाबों से पशेमानी है, नींद के नाम से जो हौल सा आता है मुझे| शहरयार
-
संस्मरण और एक गीत!
मैंने अपने जीवन और सेवाकाल से संबंधित बहुत से संस्मरण पहले शेयर किए थे, उनमें से एक को आज फिर से दोहरा रहा हूँ| लगभग ढाई वर्ष के लखनऊ प्रवास और सात वर्ष के ऊंचाहार प्रवास की कुछ छिटपुट घटनाएं याद करने का प्रयास करता हूँ। अब घटनाओं की या व्यक्तियों की उस प्रकार विस्तार…
-
कौन बुलाता है मुझे!
रात का वक़्त है सूरज है मिरा राह-नुमा, देर से दूर से ये कौन बुलाता है मुझे| शहरयार
-
क्या नज़र आता है मुझे!
दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे, फिर भी इक शख़्स में क्या क्या नज़र आता है मुझे| शहरयार
-
भटकती क्यूँ है!
मुझ से क्या पूछ रहे हो मिरी वहशत का सबब, बू-ए-आवारा से पूछो कि भटकती क्यूँ है| शहरयार
-
बात खटकती क्यूँ है!
तुझसे मिल कर भी न तन्हाई मिटेगी मेरी, दिल में रह रह के यही बात खटकती क्यूँ है| शहरयार
-
धूप के क़हर का डर!
धूप के क़हर का डर है तो दयार-ए-शब से, सर-बरहना कोई परछाईं निकलती क्यूँ है| शहरयार
-
रंग बदलती क्यूँ है!
जब भी मिलती है मुझे अजनबी लगती क्यूँ है, ज़िंदगी रोज़ नए रंग बदलती क्यूँ है| शहरयार