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जब भी फ़ुर्सत होती है!
तब हम दोनों वक़्त चुरा कर लाते थे, अब मिलते हैं जब भी फ़ुर्सत होती है| जावेद अख़्तर
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कहते हैं हैरत होती है!
अक्सर वो कहते हैं वो बस मेरे हैं, अक्सर क्यूँ कहते हैं हैरत होती है| जावेद अख़्तर
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शय की क़ीमत होती है
ग़म होते हैं जहाँ ज़ेहानत होती है, दुनिया में हर शय की क़ीमत होती है| जावेद अख़्तर
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शतरंज खेलो और प्रेम करो!
श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम में मैं अभी अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में शामिल श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर कर रहा हूँ और इसके अंतर्गत आज मैं चौथा सप्तक में शामिल एक कवि श्री राजकुमार कुंभज जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री राजकुमार कुंभज…
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उसको भूल जाऊँगी!
जवाज़* ढूँड रहा था नई मोहब्बत का, वो कह रहा था कि मैं उसको भूल जाऊँगी| *Justification परवीन शाकिर