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न तिरे साथ बनेगी!
ये हमसे न होगा कि किसी एक को चाहें, ऐ इश्क़ हमारी न तिरे साथ बनेगी| जाँ निसार अख़्तर
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कुछ और तो क्या!
ऐ नावक-ए-ग़म दिल में है इक बूँद लहू की, कुछ और तो क्या हम से मुदारात बनेगी| जाँ निसार अख़्तर
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आख़िर कोई तक़रीब!
उनसे यही कह आएँ कि अब हम न मिलेंगे, आख़िर कोई तक़रीब-ए-मुलाक़ात बनेगी| जाँ निसार अख़्तर
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रात की औक़ात बनेगी!
सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी, तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी| जाँ निसार अख़्तर
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ओ2 और ईस्ट हैम!
लंदन में पहले की गई यात्राओं की तरह इस बार के प्रवास में भी पिछले सप्ताहांत में हमने इन दो स्थानों का भ्रमण किया| ओ2 तो ऐसा मान सकते हैं हमारे यहाँ से नदी पार ही है, जैसा किसी ज़माने में मेरे लिए शाहदरा से दिल्ली आना होता था| वहाँ यमुना नदी थी, जिस पर…
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लिए ग़ुबार चले!
न जाने कौन सी मिट्टी वतन की मिट्टी थी, नज़र में धूल जिगर में लिए ग़ुबार चले| गुलज़ार
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रुक के बार बार चले!
रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले, क़रार दे के तिरे दर से बे-क़रार चले| गुलज़ार