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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th Aug 2023

    न तिरे साथ बनेगी!

    ये हमसे न होगा कि किसी एक को चाहें, ऐ इश्क़ हमारी न तिरे साथ बनेगी| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Aug 2023

    कुछ और तो क्या!

    ऐ नावक-ए-ग़म दिल में है इक बूँद लहू की, कुछ और तो क्या हम से मुदारात बनेगी| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Aug 2023

    आख़िर कोई तक़रीब!

    उनसे यही कह आएँ कि अब हम न मिलेंगे, आख़िर कोई तक़रीब-ए-मुलाक़ात बनेगी| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Aug 2023

    रात की औक़ात बनेगी!

    सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी, तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Aug 2023

    ओ2 और ईस्ट हैम!

    लंदन में पहले की गई यात्राओं की तरह इस बार के प्रवास में भी पिछले सप्ताहांत में हमने इन दो स्थानों का भ्रमण किया| ओ2 तो ऐसा मान सकते हैं हमारे यहाँ से नदी पार ही है, जैसा किसी ज़माने में मेरे लिए शाहदरा से दिल्ली आना होता था| वहाँ यमुना नदी थी, जिस पर…

  • 7th Aug 2023

    गुनाहगार चले!

    मिली है शम्अ‘ से ये रस्म-ए-आशिक़ी हमको, गुनाह हाथ पे ले कर गुनाहगार चले|     गुलज़ार

  • 7th Aug 2023

    ज़िंदगी गुज़ार चले!

    सहर न आई कई बार नींद से जागे, थी रात रात की ये ज़िंदगी गुज़ार चले| गुलज़ार

  • 7th Aug 2023

    लिए ग़ुबार चले!

    न जाने कौन सी मिट्टी वतन की मिट्टी थी, नज़र में धूल जिगर में लिए ग़ुबार चले| गुलज़ार

  • 7th Aug 2023

    पैरहन उतार चले!

    उठाए फिरते थे एहसान जिस्म का जाँ पर, चले जहाँ से तो ये पैरहन उतार चले| गुलज़ार

  • 7th Aug 2023

    रुक के बार बार चले!

    रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले, क़रार दे के तिरे दर से बे-क़रार चले| गुलज़ार

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