-
उससे लिपट के रो लेते!
दुखों का बोझ अकेले नहीं सँभलता है, कहीं वो मिलता तो उससे लिपट के रो लेते| बशीर बद्र
-
तन्हाइयों में रो लेते!
किसी की याद में पलकें ज़रा भिगो लेते, उदास रात की तन्हाइयों में रो लेते| बशीर बद्र
-
वही दीवार जिसे!
सुब्ह होते ही उभर आती है सालिम होकर, वही दीवार जिसे रोज़ मैं मिस्मार करूँ| निदा फ़ाज़ली
-
न बादल न हवा!
मिरे क़ब्ज़े में न मिट्टी है न बादल न हवा, फिर भी चाहत है कि हर शाख़ समर-बार करूँ| निदा फ़ाज़ली
-
दर-ओ-दीवार करूँ!
पहले सोचूँ उसे फिर उसकी बनाऊँ तस्वीर, और फिर उसमें ही पैदा दर-ओ-दीवार करूँ| निदा फ़ाज़ली
-
प्रेयसी!
श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम में एक बार फिर से मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की कविता शेयर कर रहा हूँ| निराला जी की कृति – ‘राम की शक्ति पूजा’ अपने आप में एक अमर रचना है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला…
-
तिरा दीदार करूँ!
तू क़रीब आए तो क़ुर्बत का यूँ इज़हार करूँ, आइना सामने रख कर तिरा दीदार करूँ| निदा फ़ाज़ली
-
मेरे लिए जगह करो!
मेरी नशिस्त पे भी कल आएगा कोई दूसरा, तुम भी बना के रास्ता मेरे लिए जगह करो| निदा फ़ाज़ली
-
न कहे सुना करो!
दिल में जिसे बसाओ तुम चाँद उसे बनाओ तुम, वो जो कहे पढ़ा करो जो न कहे सुना करो| निदा फ़ाज़ली