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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th Aug 2023

    शिकायत का धुआँ!

    शिकायत का धुआँ आँखों से दिल तक, तअ’ल्लुक़ टूट जाना चाहता है| वसीम बरेलवी

  • 15th Aug 2023

    सर झुकाना चाहता है!

    क़लम करना कहाँ है उसका मंशा, वो मेरा सर झुकाना चाहता है| वसीम बरेलवी

  • 15th Aug 2023

    सारा ज़माना चाहता है!

    मुझे देखो कि मैं उसको ही चाहूँ, जिसे सारा ज़माना चाहता है| वसीम बरेलवी

  • 15th Aug 2023

    क्या बताना चाहता है!

    वो मुझको क्या बताना चाहता है, जो दुनिया से छुपाना चाहता है| वसीम बरेलवी

  • 15th Aug 2023

    सौंदर्य-बोध!

    आज एक बार फिर से मैं साहित्य की लगभग सभी विधाओं में योगदान करने वाले प्रमुख साहित्यकार एवं कवि श्री रामदरश मिश्र  जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र  जी की यह कविता – सौंदर्य-बोधमानव-मन…

  • 14th Aug 2023

    तुम भी संगसार न हो!

    गुनाहगारों पे उँगली उठाए देते हो, ‘वसीम’ आज कहीं तुम भी संगसार न हो| वसीम बरेलवी

  • 14th Aug 2023

    आँसू भरे ज़माने में!

    दुखी समाज में आँसू भरे ज़माने में, उसे ये कौन बताए कि अश्क-बार न हो| वसीम बरेलवी

  • 14th Aug 2023

    मेरा ग़म-गुसार न हो!

    ज़रा सी बात पे घुट घुट के सुब्ह कर देना, मिरी तरह भी कोई मेरा ग़म-गुसार न हो| वसीम बरेलवी

  • 14th Aug 2023

    मेरा इंतिज़ार न हो!

    मैं गाँव लौट रहा हूँ बहुत दिनों के बाद, ख़ुदा करे कि उसे मेरा इंतिज़ार न हो| वसीम बरेलवी

  • 14th Aug 2023

    मौजों पे इख़्तियार न हो

    हवा ख़िलाफ़ हो मौजों पे इख़्तियार न हो, ये कैसी ज़िद है कि दरिया किसी से पार न हो| वसीम बरेलवी

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