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घर जाने की जल्दी थी!
उसे अब के वफ़ाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी, मगर इस बार मुझको अपने घर जाने की जल्दी थी| राहत इंदौरी
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तल्ख़ियाँ भी लाज़मी हैं!
तल्ख़ियाँ भी लाज़मी हैं ज़िंदगी के वास्ते, इतना मीठा बन के मत रहिए शकर हो जाएगी| राहत इंदौरी
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पनघट!
आज फिर से मैं प्रसिद्ध हिन्दी व्यंग्यकार और कवि स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| त्यागी जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की यह कविता – ग्राम अलका अप्सराएँपनघट पर नीर भरे! सुन्दर सजीले अंगअचल हिले खुले पंखवस्त्र…
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दर्द-ए-सर हो जाएगी!
तुमने ख़ुद ही सर चढ़ाई थी सो अब चक्खो मज़ा, मैं न कहता था कि दुनिया दर्द-ए-सर हो जाएगी| राहत इंदौरी
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साथ रहती ‘उम्र-भर!
ज़िंदगी भी काश मेरे साथ रहती ‘उम्र-भर, ख़ैर अब जैसे भी होनी है बसर हो जाएगी| राहत इंदौरी
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तो सहर हो जाएगी!
जुगनुओं को साथ लेकर रात रौशन कीजिए, रास्ता सूरज का देखा तो सहर हो जाएगी| राहत इंदौरी
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हम-सफ़र हो जाएगी!
पाँव पत्थर करके छोड़ेगी अगर रुक जाइए, चलते रहिए तो ज़मीं भी हम-सफ़र हो जाएगी| राहत इंदौरी
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उदास मैं!
आज एक बार फिर से मैं साहित्य की लगभग सभी विधाओं में योगदान करने वाले प्रमुख साहित्यकार, कवि और धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भारती जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती…