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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th Aug 2023

    ख़ता के बग़ैर भी!

    हम बे-क़ुसूर लोग भी दिलचस्प लोग हैं, शर्मिंदा हो रहे हैं ख़ता के बग़ैर भी| मुनव्वर राना

  • 18th Aug 2023

    क़ज़ा के बग़ैर भी!

    अब ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं रहा, मरने लगे हैं लोग क़ज़ा के बग़ैर भी| मुनव्वर राना

  • 18th Aug 2023

    वफ़ा के बग़ैर भी!

    बरसों से इस मकान में रहते हैं चंद लोग, इक दूसरे के साथ वफ़ा के बग़ैर भी| मुनव्वर राना

  • 18th Aug 2023

    दुआ के बग़ैर भी!

    साँसों का कारोबार बदन की ज़रूरतें, सब कुछ तो चल रहा है दुआ के बग़ैर भी| मुनव्वर राना

  • 18th Aug 2023

    दवा के बग़ैर भी!

    अच्छी से अच्छी आब-ओ-हवा के बग़ैर भी, ज़िंदा हैं कितने लोग दवा के बग़ैर भी| मुनव्वर राना

  • 18th Aug 2023

    सारा देश हमारा!

    आज फिर से मैं प्रसिद्ध राजनेता और कवि स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| बैरागी जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की यह कविता – केरल से कारगिल घाटी तकगोहाटी से चौपाटी तकसारा देश हमाराजीना हो तो मरना…

  • 17th Aug 2023

    कम-ज़र्फ़ चेहरों को!

    मैं साबित किस तरह करता कि हर आईना झूटा है, कई कम-ज़र्फ़ चेहरों को उतर जाने की जल्दी थी| राहत इंदौरी

  • 17th Aug 2023

    मर जाने की जल्दी थी!

    वो शाख़ों से जुदा होते हुए पत्तों पे हँसते थे, बड़े ज़िंदा-नज़र थे जिनको मर जाने की जल्दी थी| राहत इंदौरी

  • 17th Aug 2023

    जाने की जल्दी थी!

    मैं आख़िर कौन सा मौसम तुम्हारे नाम कर देता, यहाँ हर एक मौसम को गुज़र जाने की जल्दी थी| राहत इंदौरी

  • 17th Aug 2023

    मगर मेरे क़बीले को!

    मैं अपनी मुट्ठियों में क़ैद कर लेता ज़मीनों को, मगर मेरे क़बीले को बिखर जाने की जल्दी थी| राहत इंदौरी

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