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इंक़लाब-ए-पैहम है!
इसमें ठहराव या सुकून कहाँ, ज़िंदगी इंक़लाब-ए-पैहम* है| *Continuous struggle फ़िराक़ गोरखपुरी
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दिवाना हो गया है!
किसी ने देखे हैं पतझड़ में फूल खिलते हुए, दिल अपनी ख़ुश-नज़री में दिवाना हो गया है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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परिंद अपने परों का!
फ़ज़ा-ए-शौक़ में उसकी बिसात ही क्या थी, परिंद अपने परों का निशाना हो गया है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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झोंका बहाना हो गया है
हमें तो ख़ैर बिखरना ही था कभी न कभी, हवा-ए-ताज़ा का झोंका बहाना हो गया है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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कला!
आज एक बार फिर से मैं अपनी तरह के एक अनोखे कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बातचीत के लहज़े में बहुत सहज रूप से गहरी बात कह देते थे| भवानी दादा की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है…
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कोई चराग़ सफ़र पर!
चमक रहा है उफ़ुक़ तक ग़ुबार-ए-तीरा-शबी, कोई चराग़ सफ़र पर रवाना हो गया है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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ज़माना हो गया है!
बदन में जैसे लहू ताज़ियाना हो गया है, उसे गले से लगाए ज़माना हो गया है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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मेहराब देखने के लिए!
कहाँ है तू कि यहाँ जल रहे हैं सदियों से, चराग़ दीदा ओ मेहराब देखने के लिए| इरफ़ान सिद्दीक़ी