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बाँटा नहीं गया!
नक़्शे में आज ढूँडने बैठा हूँ वो ज़मीं, जिसको हज़ार टुकड़ों में बाँटा नहीं गया| राजेश रेड्डी
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जो देखा नहीं गया!
आँखों पे ऐसा वक़्त भी गुज़रा है बार-हा, वो देखना पड़ा है जो देखा नहीं गया| राजेश रेड्डी
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ठहरा नहीं गया!
दुनिया से, जिससे आगे का सोचा नहीं गया, हमसे वहाँ पहुँच के भी ठहरा नहीं गया| राजेश रेड्डी
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जान से तो जा चुके!
आपकी बातों में आकर जान से तो जा चुके, अब तो इनमें ज़हर की मिक़दार कम कर दीजिए| राजेश रेड्डी
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अंधकार बढ़ता !
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी गीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| बच्चन जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी की यह कविता – अंधकार बढ़ता जाता है! मिटता अब तरु-तरु में अंतर,तम…
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बीमार कम कर दीजिए
सोचिए अब इतने चारागर कहाँ से आएँगे, मुस्कुरा कर अपने कुछ बीमार कम कर दीजिए| राजेश रेड्डी
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जब तवज्जोह ही नहीं!
जब तवज्जोह ही नहीं मौजूदगी किस काम की, इस कहानी में मिरा किरदार कम कर दीजिए| राजेश रेड्डी
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यार कम कर दीजिए!
दुश्मनों की ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाएगी तादाद कम, यारों की फ़िहरिस्त में कुछ यार कम कर दीजिए| राजेश रेड्डी
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ख़लल अच्छा नहीं!
अपनी तन्हाई में इतना भी ख़लल अच्छा नहीं, आप अपने आप से गुफ़्तार* कम कर दीजिए| *Discussion राजेश रेड्डी
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बे-घरी का अपनी!
बे-घरी का अपनी ये इज़हार कम कर दीजिए, शे’र में ज़िक्र-ए-दर-ओ-दीवार कम कर दीजिए| राजेश रेड्डी