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जाँ पर वबाल वैसे ही!
तुझे है मश्क़-ए-सितम* का मलाल वैसे ही, हमारी जान थी जाँ पर वबाल वैसे ही| *Cruelty अहमद फ़राज़
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‘मॉड’ वन!
आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार और कुशल मंच संचालक श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में सोम जी ने आधुनिकता के वातावरण का बहुत सुंदर चित्रण किया है| सोम जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर…
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चाँद सितारे साथ रहे!
हिज्र में शब भर दर्द-ओ-तलब के चाँद सितारे साथ रहे, सुब्ह की वीरानी में यारो कैसे बसर औक़ात करें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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लहू अपनी गर्दन पे!
क़त्ल-ए-दिल-ओ-जाँ अपने सर है अपना लहू अपनी गर्दन पे, मोहर-ब-लब बैठे हैं किसका शिकवा किसके साथ करें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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रौशन अपनी रात करें!
शाम हुई फिर जोश-ए-क़दह* ने बज़्म-ए-हरीफ़ाँ**रौशन की, घर को आग लगाएँ हम भी रौशन अपनी रात करें| *शराब पीने का जोश, **जीवन की महफ़िल फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दर्द थमे तो बात करें!
अब जो कोई पूछे भी तो उससे क्या शरह-ए-हालात करें, दिल ठहरे तो दर्द सुनाएँ दर्द थमे तो बात करें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़