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मसीहा की नज़र से!
गिर जाओगे तुम अपने मसीहा की नज़र से, मर कर भी इलाज-ए-दिल-ए-बीमार न माँगो| क़तील शिफ़ाई
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तलवार न माँगो!
यारो किसी क़ातिल से कभी प्यार न माँगो, अपने ही गले के लिए तलवार न माँगो| क़तील शिफ़ाई
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ज़ख़्म न जाने मेरे!
चारा-गर* यूँ तो बहुत हैं मगर ऐ जान-ए-‘फ़राज़’, जुज़ तिरे** और कोई ज़ख़्म न जाने मेरे| *Doctors, *ExceptYou अहमद फ़राज़
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अहद-ए-वफ़ा ने मेरे!
तू है किस हाल में ऐ ज़ूद-फ़रामोश* मिरे, मुझको तो छीन लिया अहद-ए-वफ़ा ने मेरे| *भुलक्कड़ अहमद फ़राज़
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अश्रु आचमन!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत – अगर शपथ की परिधि न होतीमेरी पीरकथा हो जाती पिंजरे का…
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होते थे ज़माने मेरे!
आज इक और बरस बीत गया उसके बग़ैर, जिसके होते हुए होते थे ज़माने मेरे| अहमद फ़राज़
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ये भी ख़ज़ाने मेरे!
लुट के भी ख़ुश हूँ कि अश्कों से भरा है दामन, देख ग़ारत-गर-ए-दिल* ये भी ख़ज़ाने मेरे| *लुटे हुए दिल अहमद फ़राज़