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सुनाते हैं फ़साने मेरे!
ख़ल्क़* की बे-ख़बरी है कि मिरी रुस्वाई, लोग मुझको ही सुनाते हैं फ़साने मेरे| *दुनिया अहमद फ़राज़
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रोता रहा कोई!
शम्अ की लौ थी कि वो तू था मगर हिज्र* की रात, देर तक रोता रहा कोई सिरहाने मेरे| *जुदाई अहमद फ़राज़
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तू भी ख़ुशबू है मगर!
तू भी ख़ुशबू है मगर मेरा तजस्सुस* बेकार, बर्ग-ए-आवारा** की मानिंद ठिकाने मेरे| *तलाश, *उड़ता (आवारा) पत्ता अहमद फ़राज़
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शाकाहारी मन!
आज मैं मेरे अग्रज और गुरुतुल्य रहे हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत – माँसाहारी जग-होटल मेंशाकाहारी मनकैसे करे गुजारा?होटल-जिसमें एक-दूसरे…
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ऐ दोस्त पुराने मेरे!
जुज़* तिरे कोई भी दिन रात न जाने मेरे, तू कहाँ है मगर ऐ दोस्त पुराने मेरे| *सिवाय अहमद फ़राज़
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पूछा था हाल वैसे ही!
मुझे भी शौक़ न था दास्ताँ सुनाने का, ‘फ़राज़’ उसने भी पूछा था हाल वैसे ही| अहमद फ़राज़
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दुश्मनी तो क्या रखता!
ज़माना हमसे भला दुश्मनी तो क्या रखता, सो कर गया है हमें पाएमाल* वैसे ही| *बर्बाद अहमद फ़राज़
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हाथों से ढाल वैसे ही!
मैं रोकना ही नहीं चाहता था वार उसका, गिरी नहीं मिरे हाथों से ढाल वैसे ही| अहमद फ़राज़
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फेंका था जाल वैसे ही!
हम आ गए हैं तह-ए-दाम* तो नसीब अपना, वगरना उसने तो फेंका था जाल वैसे ही| *Inside the Net अहमद फ़राज़
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तुम्हारा ख़याल वैसे ही!
चला था ज़िक्र ज़माने की बेवफ़ाई का, सो आ गया है तुम्हारा ख़याल वैसे ही| अहमद फ़राज़