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आज पहली बार!
आज एक बार फिर से मैं अपने समय के अत्यंत श्रेष्ठ कवि और दिनमान पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता…
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छेड़ती गर्दिश-ए-चर्ख़!
और क्यूँ छेड़ती है गर्दिश-ए-चर्ख़*, वो नज़र फिर गई ये क्या कम है| *संकटों का चक्र फ़िराक़ गोरखपुरी
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वो ज़ुल्फ़ बरहम है!
जैसे उछले जुनूँ की पहली शाम, इस अदा से वो ज़ुल्फ़ बरहम* है| *तितर बितर फ़िराक़ गोरखपुरी
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बे तिरे जहन्नम है!
ऐ मोहब्बत तू इक अज़ाब* सही, ज़िंदगी बे तिरे जहन्नम है| *Suffering फ़िराक़ गोरखपुरी
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ज़िंदगी का मातम है!
ये भी नज़्म-ए-हयात* है कोई, ज़िंदगी ज़िंदगी का मातम है| *SongOfLife फ़िराक़ गोरखपुरी
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फिर छूटेगा लंदन!
पिछली दो बार की तरह एक बार फिर लंदन प्रवास का अंत होने को है, यहाँ रहते हुए अंतिम सप्ताहांत भी निकल गया, इस रविवार को एक बार फिर से हम भारतीयों के प्रिय स्थान साउथ हॉल गए, वहाँ कुछ खरीदारी की और मनपसंद खाना खाया| गोवा लौटने के बाद यहाँ का प्रवास फिर से…