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उसके लिए दुआ करो!
शोहरत भी उसके साथ है दौलत भी उसके हाथ है, ख़ुद से भी वो मिले कभी उसके लिए दुआ करो| निदा फ़ाज़ली
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हिमाद्रि तुंग शृंग से!
श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम में एक बार फिर से मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की कविता शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी को प्रकृति, देशभक्ति और ओज के सशक्त कवि के रूप में जाना जाता है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की…
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घर में ख़ुदा ख़ुदा करो!
अच्छी नहीं ये ख़ामुशी शिकवा करो गिला करो, यूँ भी न कर सको तो फिर घर में ख़ुदा ख़ुदा करो| निदा फ़ाज़ली
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आग छुपा दी जाए!
हमसे पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या, चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
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जाड़े की गुलाबी रातें!
कम नहीं नश्शे में जाड़े की गुलाबी रातें, और अगर तेरी जवानी भी मिला दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
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क्यूँ न खिलते हुए!
इन्हीं गुल-रंग दरीचों से सहर झाँकेगी, क्यूँ न खिलते हुए ज़ख़्मों को दुआ दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
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चटानों में दबा दी जाए!
दिल का वो हाल हुआ है ग़म-ए-दौराँ के तले, जैसे इक लाश चटानों में दबा दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
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जीवन-डाली से!
श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम में एक बार फिर से मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की कविता शेयर कर रहा हूँ| पंत जी को प्रकृति के सुकुमार कवि भी कहा जाता है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता – झर पड़ता…
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ये रस्म उठा दी जाए!
जब लगें ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए, है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
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तो कुछ बात बनेगी!
ये क्या है कि बढ़ते चलो बढ़ते चलो आगे, जब बैठ के सोचेंगे तो कुछ बात बनेगी| जाँ निसार अख़्तर