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आँखें झपकते रहते हैं!
भरे हैं रात के रेज़े कुछ ऐसे आँखों में, उजाला हो तो हम आँखें झपकते रहते हैं| गुलज़ार
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ये रोटियाँ हैं ये सिक्के
ये रोटियाँ हैं ये सिक्के हैं और दाएरे हैं, ये एक दूजे को दिन भर पकड़ते रहते हैं| गुलज़ार
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मान भी लूँ !
श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम में मैं अभी अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में शामिल श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर कर रहा हूँ और इसके अंतर्गत आज मैं चौथा सप्तक में शामिल एक कवि श्री नंदकिशोर आचार्य जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नंदकिशोर आचार्य…
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बख़िये उधड़ते रहते हैं!
मुझे तो रोज़ कसौटी पे दर्द कसता है, कि जाँ से जिस्म के बख़िये उधड़ते रहते हैं| गुलज़ार
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चढ़ते उतरते रहते हैं!
बस एक वहशत-ए-मंज़िल है और कुछ भी नहीं, कि चंद सीढ़ियाँ चढ़ते उतरते रहते हैं| गुलज़ार
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आत्म छलना-2
श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम में मैं अभी अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में शामिल श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर कर रहा हूँ और इसके अंतर्गत आज मैं चौथा सप्तक में शामिल एक कवि स्वर्गीय स्वदेश भारती जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| उन्होंने इस एक ही शीर्षक से की…