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राख उठाऊँगी!
बिछा दिया था गुलाबों के साथ अपना वजूद, वो सो के उट्ठे तो ख़्वाबों की राख उठाऊँगी| परवीन शाकिर
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अकेले में गुनगुनाऊँगी!
अब उसका फ़न तो किसी और से हुआ मंसूब, मैं किसकी नज़्म अकेले में गुनगुनाऊँगी| परवीन शाकिर
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दोस्त जल्दी मिलो!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में शामिल श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम मे आज मैं चौथा सप्तक में शामिल एक कवि स्वर्गीय अवधेश कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अवधेश कुमार जी की यह कविता – सुबह–एक हल्की-सी चीख़ की तरहबहुत पीली और उदास…
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किसे मनाऊँगी!
वो क्या गया कि रिफ़ाक़त के सारे लुत्फ़ गए, मैं किस से रूठ सकूँगी किसे मनाऊँगी| परवीन शाकिर
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आँखों में मुस्कुराऊँगी!
बदन के कर्ब को वो भी समझ न पाएगा, मैं दिल में रोऊँगी आँखों में मुस्कुराऊँगी| परवीन शाकिर
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चाँदनी के हाथों में!
सुपुर्द करके उसे चाँदनी के हाथों में, मैं अपने घर के अँधेरों को लौट आऊँगी| परवीन शाकिर
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दुल्हन सजाऊँगी!
कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी, मैं अपने हाथ से उसकी दुल्हन सजाऊँगी| परवीन शाकिर
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कोई सुनाता है मुझे!
क़िस्सा-ए-दर्द में ये बात कहाँ से आई, मैं बहुत हँसता हूँ जब कोई सुनाता है मुझे| शहरयार