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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Aug 2023

    जंगलों की साँसें हैं!

    समाअ‘तों में घने जंगलों की साँसें हैं, मैं अब कभी तिरी आवाज़ सुन न पाऊँगी| परवीन शाकिर

  • 3rd Aug 2023

    राख उठाऊँगी!

    बिछा दिया था गुलाबों के साथ अपना वजूद, वो सो के उट्ठे तो ख़्वाबों की राख उठाऊँगी| परवीन शाकिर

  • 3rd Aug 2023

    बेनाम भी नहीं लेकिन!

    वो एक रिश्ता-ए-बेनाम भी नहीं लेकिन, मैं अब भी उसके इशारों पे सर झुकाऊँगी| परवीन शाकिर

  • 3rd Aug 2023

    अकेले में गुनगुनाऊँगी!

    अब उसका फ़न तो किसी और से हुआ मंसूब, मैं किसकी नज़्म अकेले में गुनगुनाऊँगी| परवीन शाकिर

  • 3rd Aug 2023

    दोस्त जल्दी मिलो!

    अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में शामिल श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम मे आज मैं चौथा सप्तक में शामिल एक कवि स्वर्गीय अवधेश कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अवधेश कुमार जी की यह कविता – सुबह–एक हल्की-सी चीख़ की तरहबहुत पीली और उदास…

  • 2nd Aug 2023

    किसे मनाऊँगी!

    वो क्या गया कि रिफ़ाक़त के सारे लुत्फ़ गए, मैं किस से रूठ सकूँगी किसे मनाऊँगी| परवीन शाकिर

  • 2nd Aug 2023

    आँखों में मुस्कुराऊँगी!

    बदन के कर्ब को वो भी समझ न पाएगा, मैं दिल में रोऊँगी आँखों में मुस्कुराऊँगी| परवीन शाकिर

  • 2nd Aug 2023

    चाँदनी के हाथों में!

    सुपुर्द करके उसे चाँदनी के हाथों में, मैं अपने घर के अँधेरों को लौट आऊँगी| परवीन शाकिर

  • 2nd Aug 2023

    दुल्हन सजाऊँगी!

    कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी, मैं अपने हाथ से उसकी दुल्हन सजाऊँगी| परवीन शाकिर

  • 2nd Aug 2023

    कोई सुनाता है मुझे!

    क़िस्सा-ए-दर्द में ये बात कहाँ से आई, मैं बहुत हँसता हूँ जब कोई सुनाता है मुझे|     शहरयार

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