-
रंगत फीकी पड़ गई!
महक अजब सी हो गई पड़े पड़े संदूक़ में, रंगत फीकी पड़ गई रेशम के रूमाल की| मुनीर नियाज़ी
-
यही सदा घड़ियाल की!
आई है अब याद क्या रात इक बीते साल की, यही हवा थी बाग़ में यही सदा घड़ियाल की| मुनीर नियाज़ी
-
चार पहर से पहले!
जी बहलता ही नहीं अब कोई साअ‘त कोई पल, रात ढलती ही नहीं चार पहर से पहले| इब्न-ए-इंशा
-
घबराए न तरसे पहले!
इश्क़ पहले भी किया हिज्र का ग़म भी देखा, इतने तड़पे हैं न घबराए न तरसे पहले| इब्न-ए-इंशा
-
धब्बे और तस्वीर!
आज मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ एक महत्वपूर्ण कवि स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| उनकी ज्यादा रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की यह कविता – वह चित्र भी झूठा नहीं :तब प्रेम बचपन ही सहीसंसार ही जब…
-
ख़ाक-बसर से पहले!
चल दिए उठ के सू-ए-शहर-ए-वफ़ा कू-ए-हबीब, पूछ लेना था किसी ख़ाक-बसर से पहले| इब्न-ए-इंशा
-
इश्क़ में घर से पहले!
अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले, दश्त पड़ता है मियाँ इश्क़ में घर से पहले| इब्न-ए-इंशा
-
मिरा मेहमाँ होता है!
वो दर्द कि उसने छीन लिया वो दर्द कि उसकी बख़्शिश था, तन्हाई की रातों में ‘इंशा’ अब भी मिरा मेहमाँ होता है| इब्न-ए-इंशा
-
रोज़ मुसलमाँ होता है!
फिर उनकी गली में पहुँचेगा फिर सहव का सज्दा कर लेगा, इस दिल पे भरोसा कौन करे हर रोज़ मुसलमाँ होता है| इब्न-ए-इंशा
-
जो पिन्हाँ होता है!
हम तेरी सिखाई मंतिक़* से अपने को तो समझा लेते हैं, इक ख़ार खटकता रहता है सीने में जो पिन्हाँ होता है| *ज्ञान इब्न-ए-इंशा