-
किसके तसव्वुर में जाने
दिल किसके तसव्वुर में जाने रातों को परेशाँ होता है, ये हुस्न-ए-तलब की बात नहीं होता है मिरी जाँ होता है| इब्न-ए-इंशा
-
बन जाता दीप्तिवान!
आज मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ एक महत्वपूर्ण कवि स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| उनकी रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की यह कविता – सूरज सवेरे से जैसे उगा ही नहीं बीत गया सारा दिन बैठे हुए…
-
शाम से पहचानते हैं!
पौ फटे क्यूँ मिरी पलकों पे सजाते हो इन्हें, ये सितारे तो मुझे शाम से पहचानते हैं| क़तील शिफ़ाई
-
अंजाम से पहचानते हैं!
आईना-दार-ए-मोहब्बत हूँ कि अरबाब-ए-वफ़ा, अपने ग़म को मिरे अंजाम से पहचानते हैं| क़तील शिफ़ाई
-
इल्ज़ाम से पहचानते हैं!
दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं, लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं| क़तील शिफ़ाई
-
जो मुमकिन ही नहीं है!
उस चीज़ का क्या ज़िक्र जो मुमकिन ही नहीं है, सहरा में कभी साया-ए-दीवार न माँगो| क़तील शिफ़ाई
-
इज़हार न माँगो!
सच बात पे मिलता है सदा ज़हर का पियाला, जीना है तो फिर जीने का इज़हार न माँगो| क़तील शिफ़ाई
-
निगाहों का भरम भी!
खुल जाएगा इस तरह निगाहों का भरम भी, काँटों से कभी फूल की महकार न माँगो| क़तील शिफ़ाई
-
मसीहा की नज़र से!
गिर जाओगे तुम अपने मसीहा की नज़र से, मर कर भी इलाज-ए-दिल-ए-बीमार न माँगो| क़तील शिफ़ाई
-
कभी प्यार न माँगो!
यारो किसी क़ातिल से कभी प्यार न माँगो, अपने ही गले के लिए तलवार न माँगो| क़तील शिफ़ाई