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इस बार का लंदन!
एक बार फिर मैं लंदन की यात्रा पर हूँ, यह मेरा तीसरा लंदन प्रवास है, एक माह से अधिक समय के लिए| आने पर लगता है देख लिया जाए कि सब चीजें अपनी जगह पर ही हैं न, कैनेरी वार्फ़ के स्टेशन | पिछली बार तक दो स्टेशन थे यहाँ पास में, एक जुबली लाइन…
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शीशे सा बदन!
बारिश-ए-संग का मौसम है मिरे शहर में तो, तू ये शीशे सा बदन ले के कहाँ आ गई दोस्त| अहमद फ़राज़
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तिरा दिल शामिल है!
तेरे लहजे की थकन में तिरा दिल शामिल है, ऐसा लगता है जुदाई की घड़ी आ गई दोस्त| अहमद फ़राज़
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गुज़र भी गई दोस्त!
अब भी आए हो तो एहसान तुम्हारा लेकिन, वो क़यामत जो गुज़रनी थी गुज़र भी गई दोस्त| अहमद फ़राज़
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कोई भूली हुई दोस्त!
याद आई है तो फिर टूट के याद आई है, कोई गुज़री हुई मंज़िल कोई भूली हुई दोस्त| अहमद फ़राज़
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नज़र खा गई दोस्त!
तेरे क़ामत से भी लिपटी है अमर-बेल कोई, मेरी चाहत को भी दुनिया की नज़र खा गई दोस्त| अहमद फ़राज़
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कई दुश्मन कई दोस्त!
लोग हर बात का अफ़्साना बना देते हैं, ये तो दुनिया है मिरी जाँ कई दुश्मन कई दोस्त| अहमद फ़राज़
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ऐ अजनबी दोस्त!
तुझसे मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त, तू मिरी पहली मोहब्बत थी मिरी आख़िरी दोस्त| अहमद फ़राज़
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उषा स्तवन-3
आज मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ एक महत्वपूर्ण कवि स्वर्गीय मदन वात्स्यायन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| उनकी रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मदन वात्स्यायन जी की यह कविता – मुझे पूरब की एक डायन से मुहब्बत है ।वह अप्सरा है ; उस…
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दिल ही न बुझ चले!
ये सुकून-ए-जाँ की घड़ी ढले तो चराग़-ए-दिल ही न बुझ चले, वो बला से हो ग़म-ए-इश्क़ या ग़म-ए-रोज़गार कोई तो हो| अहमद फ़राज़