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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 25th Jul 2023

    इस बार का लंदन!

    एक बार फिर मैं लंदन की यात्रा पर हूँ, यह मेरा तीसरा लंदन प्रवास है, एक माह से अधिक समय के लिए| आने पर लगता है देख लिया जाए कि सब चीजें अपनी जगह पर ही हैं न, कैनेरी वार्फ़ के स्टेशन | पिछली बार तक दो स्टेशन थे यहाँ पास में, एक जुबली लाइन…

  • 25th Jul 2023

    शीशे सा बदन!

    बारिश-ए-संग का मौसम है मिरे शहर में तो, तू ये शीशे सा बदन ले के कहाँ आ गई दोस्त| अहमद फ़राज़

  • 24th Jul 2023

    तिरा दिल शामिल है!

    तेरे लहजे की थकन में तिरा दिल शामिल है, ऐसा लगता है जुदाई की घड़ी आ गई दोस्त| अहमद फ़राज़

  • 24th Jul 2023

    गुज़र भी गई दोस्त!

    अब भी आए हो तो एहसान तुम्हारा लेकिन, वो क़यामत जो गुज़रनी थी गुज़र भी गई दोस्त| अहमद फ़राज़

  • 24th Jul 2023

    कोई भूली हुई दोस्त!

    याद आई है तो फिर टूट के याद आई है, कोई गुज़री हुई मंज़िल कोई भूली हुई दोस्त| अहमद फ़राज़

  • 24th Jul 2023

    नज़र खा गई दोस्त!

    तेरे क़ामत से भी लिपटी है अमर-बेल कोई, मेरी चाहत को भी दुनिया की नज़र खा गई दोस्त| अहमद फ़राज़

  • 24th Jul 2023

    कई दुश्मन कई दोस्त!

    लोग हर बात का अफ़्साना बना देते हैं, ये तो दुनिया है मिरी जाँ कई दुश्मन कई दोस्त| अहमद फ़राज़ 

  • 24th Jul 2023

    ऐ अजनबी दोस्त!

    तुझसे मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त, तू मिरी पहली मोहब्बत थी मिरी आख़िरी दोस्त| अहमद फ़राज़ 

  • 24th Jul 2023

    उषा स्तवन-3

    आज मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ एक महत्वपूर्ण कवि स्वर्गीय मदन वात्स्यायन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| उनकी रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मदन वात्स्यायन जी की यह कविता – मुझे पूरब की एक डायन से मुहब्बत है ।वह अप्सरा है ; उस…

  • 23rd Jul 2023

    दिल ही न बुझ चले!

    ये सुकून-ए-जाँ की घड़ी ढले तो चराग़-ए-दिल ही न बुझ चले, वो बला से हो ग़म-ए-इश्क़ या ग़म-ए-रोज़गार कोई तो हो| अहमद फ़राज़ 

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