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उदास से बाम ओ दर!
ये उदास उदास से बाम ओ दर ये उजाड़ उजाड़ सी रह-गुज़र, चलो हम नहीं न सही मगर सर-ए-कू-ए-यार कोई तो हो| अहमद फ़राज़
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मान लें कि चमन खिले!
कहीं तार-ए-दामन-ए-गुल मिले तो ये मान लें कि चमन खिले, कि निशान फ़स्ल-ए-बहार का सर-ए-शाख़-सार कोई तो हो| अहमद फ़राज़
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ए’तिबार कोई तो हो!
किसे ज़िंदगी है अज़ीज़ अब किसे आरज़ू-ए-शब-ए-तरब, मगर ऐ निगार-ए-वफ़ा तलब तिरा ए’तिबार कोई तो हो| अहमद फ़राज़
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बे-क़रार कोई तो हो!
न हरीफ़-ए-जाँ न शरीक-ए-ग़म शब-ए-इंतिज़ार कोई तो हो, किसे बज़्म-ए-शौक़ में लाएँ हम दिल-ए-बे-क़रार कोई तो हो| अहमद फ़राज़
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लिपटी परछाइयाँ!
आज मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ एक महत्वपूर्ण कवि स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| कुँवर नारायण जी की रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की यह कविता – उन परछाइयों को,जो अभी अभी चाँद की रसवंत गागर…
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हम-कलाम कब से है!
कहाँ गए शब-ए-फ़ुर्क़त के जागने वाले, सितारा-ए-सहरी हम-कलाम कब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तेरे रंग-ए-लब से है!
अगर शरर है तो भड़के जो फूल है तो खिले, तरह तरह की तलब तेरे रंग-ए-लब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बड़े अदब से है!
हुआ है जब से दिल-ए-ना-सुबूर बे-क़ाबू, कलाम तुझ से नज़र को बड़े अदब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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किसी का दर्द हो!
किसी का दर्द हो करते हैं तेरे नाम रक़म, गिला है जो भी किसी से तिरे सबब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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न दिन को शब से है!
तिरी उमीद तिरा इंतिज़ार जब से है, न शब को दिन से शिकायत न दिन को शब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़