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ये फ़ितरत है इंसाँ की!
शिकायत क्यूँ इसे कहते हो ये फ़ितरत है इंसाँ की, मुसीबत में ख़याल-ए-ऐश-ए-रफ़्ता आ ही जाता है| जोश मलीहाबादी
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बादल छा ही जाता है!
हवाएँ ज़ोर कितना ही लगाएँ आँधियाँ बन कर, मगर जो घिर के आता है वो बादल छा ही जाता है| जोश मलीहाबादी
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वो आते हैं तो चेहरे पर!
ख़िलाफ़-ए-मस्लहत मैं भी समझता हूँ मगर नासेह, वो आते हैं तो चेहरे पर तग़य्युर आ ही जाता है| जोश मलीहाबादी
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घबरा ही जाता है!
नज़र हो ख़्वाह कितनी ही हक़ाइक़-आश्ना फिर भी, हुजूम-ए-कशमकश में आदमी घबरा ही जाता है| जोश मलीहाबादी
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ठोकर खा ही जाता है!
क़दम इंसाँ का राह-ए-दहर में थर्रा ही जाता है, चले कितना ही कोई बच के ठोकर खा ही जाता है| जोश मलीहाबादी
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तमसो मा ज्योतिर्गमय!
आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी नवगीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत – बुझी न दीप की शिखा अनन्त में समा गई।अमंद ज्योति प्राण-प्राण बीच…
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साहिलों पे खिला था जो
तुझे चाँद बन के मिला था जो तिरे साहिलों पे खिला था जो, वो था एक दरिया विसाल का सो उतर गया उसे भूल जा| अमजद इस्लाम अमजद
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दर्द था तिरे बख़्त में!
क्यूँ अटा हुआ है ग़ुबार में ग़म-ए-ज़िंदगी के फ़िशार में, वो जो दर्द था तिरे बख़्त* में सो वो हो गया उसे भूल जा| *भाग्य अमजद इस्लाम अमजद
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आस्तीं पे लहू नहीं!
कहीं चाक-ए-जाँ का रफ़ू नहीं किसी आस्तीं पे लहू नहीं, कि शहीद-ए-राह-ए-मलाल का नहीं ख़ूँ-बहा उसे भूल जा| अमजद इस्लाम अमजद
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मुस्कुरा उसे भूल जा!
किसी आँख में नहीं अश्क-ए-ग़म तिरे बअ‘द कुछ भी नहीं है कम, तुझे ज़िंदगी ने भुला दिया तू भी मुस्कुरा उसे भूल जा| अमजद इस्लाम अमजद