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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th Feb 2024

    ये फ़ितरत है इंसाँ की!

    शिकायत क्यूँ इसे कहते हो ये फ़ितरत है इंसाँ की, मुसीबत में ख़याल-ए-ऐश-ए-रफ़्ता आ ही जाता है|                  जोश मलीहाबादी

  • 15th Feb 2024

    बादल छा ही जाता है!

    हवाएँ ज़ोर कितना ही लगाएँ आँधियाँ बन कर, मगर जो घिर के आता है वो बादल छा ही जाता है|                 जोश मलीहाबादी

  • 15th Feb 2024

    वो आते हैं तो चेहरे पर!

    ख़िलाफ़-ए-मस्लहत मैं भी समझता हूँ मगर नासेह, वो आते हैं तो चेहरे पर तग़य्युर आ ही जाता है|                जोश मलीहाबादी

  • 15th Feb 2024

    घबरा ही जाता है!

    नज़र हो ख़्वाह कितनी ही हक़ाइक़-आश्ना फिर भी, हुजूम-ए-कशमकश में आदमी घबरा ही जाता है|                जोश मलीहाबादी

  • 15th Feb 2024

    ठोकर खा ही जाता है!

    क़दम इंसाँ का राह-ए-दहर में थर्रा ही जाता है, चले कितना ही कोई बच के ठोकर खा ही जाता है|                जोश मलीहाबादी

  • 15th Feb 2024

    तमसो मा ज्योतिर्गमय!

    आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी नवगीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ  सिंह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत – बुझी न दीप की शिखा अनन्त में समा गई।अमंद ज्योति प्राण-प्राण बीच…

  • 14th Feb 2024

    साहिलों पे खिला था जो

    तुझे चाँद बन के मिला था जो तिरे साहिलों पे खिला था जो, वो था एक दरिया विसाल का सो उतर गया उसे भूल जा|                     अमजद इस्लाम अमजद

  • 14th Feb 2024

    दर्द था तिरे बख़्त में!

    क्यूँ अटा हुआ है ग़ुबार में ग़म-ए-ज़िंदगी के फ़िशार में, वो जो दर्द था तिरे बख़्त* में सो वो हो गया उसे भूल जा| *भाग्य                  अमजद इस्लाम अमजद

  • 14th Feb 2024

    आस्तीं पे लहू नहीं!

    कहीं चाक-ए-जाँ का रफ़ू नहीं किसी आस्तीं पे लहू नहीं, कि शहीद-ए-राह-ए-मलाल का नहीं ख़ूँ-बहा उसे भूल जा|                    अमजद इस्लाम अमजद

  • 14th Feb 2024

    मुस्कुरा उसे भूल जा!

    किसी आँख में नहीं अश्क-ए-ग़म तिरे बअ‘द कुछ भी नहीं है कम, तुझे ज़िंदगी ने भुला दिया तू भी मुस्कुरा उसे भूल जा|                  अमजद इस्लाम अमजद                  

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