दर्द था तिरे बख़्त में!

क्यूँ अटा हुआ है ग़ुबार में ग़म-ए-ज़िंदगी के फ़िशार में,

वो जो दर्द था तिरे बख़्त* में सो वो हो गया उसे भूल जा|

*भाग्य

                 अमजद इस्लाम अमजद

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