ये फ़ितरत है इंसाँ की!

शिकायत क्यूँ इसे कहते हो ये फ़ितरत है इंसाँ की,

मुसीबत में ख़याल-ए-ऐश-ए-रफ़्ता आ ही जाता है|

                 जोश मलीहाबादी

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