Skip to content

SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
    • Activity
    • Members
    • Sample Page
    • Sample Page
    • Sample Page
    • About
    • Contact
  • 13th Oct 2023

    शहर की गलियों में!

    शहर की गलियों में गहरी तीरगी गिर्यां रही*, रात बादल इस तरह आए कि मैं तो डर गया| *अंधकार रोता रहा मुनीर नियाज़ी

  • 13th Oct 2023

    ग़लती हुई होगी!

    आज मैं देश के एक प्रसिद्ध राजनेता और श्रेष्ठ कवि श्री उदय प्रताप सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| श्री उदय प्रताप जी की कुछ  रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री उदय प्रताप सिंह जी का यह नवगीत – हमारे घर की दीवारों में अनगिनत दरारें…

  • 12th Oct 2023

    दिलरुबा मंज़र गया!

    इक झलक देखी थी उस रू-ए-दिल-आरा की कभी, फिर न आँखों से वो ऐसा दिलरुबा मंज़र गया| मुनीर नियाज़ी

  • 12th Oct 2023

    ख़ुश्बू से जादू कर गया!

    वो जो मेरे पास से होकर किसी के घर गया, रेशमी मल्बूस* की ख़ुश्बू से जादू कर गया| *Cloths मुनीर नियाज़ी

  • 12th Oct 2023

    देखोगे दो एक ही और!

    हमसे जिसके तौर हों बाबा देखोगे दो एक ही और, कहने को तो शहर-ए-कराची बस्ती दिल-ज़दगाँ की है|  इब्न-ए-इंशा

  • 12th Oct 2023

    ख़ाक किसने फाँकी है!

    मुल्कों मुल्कों शहरों शहरों जोगी बन कर घूमा कौन, ‘क़र्या-ब-क़र्या सहरा-ब-सहरा’* ख़ाक ये किस ने फाँकी है| *Villages and deserts इब्न-ए-इंशा

  • 12th Oct 2023

    दिल की बात बयाँ!

    अहल-ए-ख़िरद* तादीब** की ख़ातिर पाथर ले ले आ पहुँचे, जब कभी हमने शहर-ए-ग़ज़ल में दिल की बात बयाँ की है| *बुद्धिजीवी, **सुधार इब्न-ए-इंशा

  • 12th Oct 2023

    हाजत एक मकाँ की है!

    एक ज़रा सा गोशा दे दो अपने पास जहाँ से दूर, इस बस्ती में हम लोगों को हाजत एक मकाँ की है| इब्न-ए-इंशा

  • 12th Oct 2023

    मुफ़्त मिला है हुस्न!

    ‘इंशा’-जी उसे रोक के पूछें तुमको तो मुफ़्त मिला है हुस्न, किस लिए फिर बाज़ार-ए-वफ़ा में तुमने ये जिंस गिराँ* की है| *Made costly इब्न-ए-इंशा

  • 12th Oct 2023

    गीत एक अनवरत नदी है!

    आज मैं देश के एक श्रेष्ठ नवगीत कवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मालवीय जी की कुछ  रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत – गीत एक अनवरत नदी हैकुठिला भर नेकी हैसूप भर बदी है एक तीर…

←Previous Page
1 … 840 841 842 843 844 … 1,531
Next Page→

Blog at WordPress.com.

Privacy & Cookies: This site uses cookies. By continuing to use this website, you agree to their use.
To find out more, including how to control cookies, see here: Cookie Policy
  • Subscribe Subscribed
    SamaySakshi
    Join 1,133 other subscribers.

    Have a WordPress.com account? Log in now.

  • SamaySakshi
    View site in Reader
    Manage subscriptionsSign upLog in
    Report this content
    Collapse this bar