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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 14th Oct 2023

    ये खेल ख़त्म करो!

    कहीं न सबको समुंदर बहा के ले जाए, ये खेल ख़त्म करो कश्तियाँ बदलने का| शहरयार

  • 14th Oct 2023

    परछाइयों के चलने का

    यहाँ से गुज़रे हैं गुज़़रेंगे हम से अहल-ए-वफ़ा, ये रास्ता नहीं परछाइयों के चलने का| शहरयार

  • 14th Oct 2023

    यही तो वक़्त है!

    सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का, यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का| शहरयार

  • 14th Oct 2023

    संगीत!

    आज एक बार फिर मैं देश में अपनी तरह के अनूठे श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह छोटी सी रचना इस बात का उदाहरण है कि भवानी दादा किस प्रकार सहज भाव से चमत्कार पैदा कर देते थे| भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी…

  • 13th Oct 2023

    अब अंदर जाकर देख!

    तू भी ‘मुनीर’ अब भरे जहाँ में मिल कर रहना सीख, बाहर से तो देख लिया अब अंदर जाकर देख|     मुनीर नियाज़ी

  • 13th Oct 2023

    पास बुला कर देख!

    दरवाज़े के पास आ आ कर वापस मुड़ती चाप, कौन है इस सुनसान गली में पास बुला कर देख| मुनीर नियाज़ी

  • 13th Oct 2023

    रस्ता गए मुसाफ़िर का!

    शाम है गहरी तेज़ हवा है सर पे खड़ी है रात, रस्ता गए मुसाफ़िर का अब दिया जला कर देख| मुनीर नियाज़ी

  • 13th Oct 2023

    आँख मिला कर देख!

    तुझ से बिछड़ कर क्या हूँ मैं अब बाहर आकर देख, हिम्मत है तो मेरी हालत आँख मिला कर देख| मुनीर नियाज़ी

  • 13th Oct 2023

    दिल लहू से भर गया!

    सुब्ह-ए-काज़िब* की हवा में दर्द था कितना ‘मुनीर’, रेल की सीटी बजी तो दिल लहू से भर गया| *झूठा सवेरा मुनीर नियाज़ी

  • 13th Oct 2023

    वो मुसाफ़िर जाने किस

    थी वतन में मुंतज़िर जिसकी कोई चश्म-ए-हसीं, वो मुसाफ़िर जाने किस सहरा में जल कर मर गया| मुनीर नियाज़ी

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