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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th Oct 2023

    वो एक लम्हा कि मैं!

    मुआफ़ कर न सकी मेरी ज़िंदगी मुझको, वो एक लम्हा कि मैं तुझ से तंग आया था| जाँ निसार अख़्तर

  • 15th Oct 2023

    पहचान भी न पाया था!

    गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर* की तरह, अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था| *चिंगारी चमकने का क्षण जाँ निसार अख़्तर

  • 15th Oct 2023

    क्या मिज़ाज पाया था!

    ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था, दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था| जाँ निसार अख़्तर

  • 15th Oct 2023

    इक़बाल हो सिवा तेरा!

    जो चाहता है कि इक़बाल हो सिवा तेरा, तो सब में बाँट बराबर से शादमानी* को| *खुशी शहरयार

  • 15th Oct 2023

    ख़्वाबों की पासबानी!

    बजाए मेरे किसी और का तक़र्रुर* हो, क़ुबूल जो करे ख़्वाबों की पासबानी को| *तैनाती शहरयार

  • 15th Oct 2023

    सियाह रात ने..

    सियाह रात ने बेहाल कर दिया मुझको, कि तूल दे नहीं पाया किसी कहानी को| शहरयार

  • 15th Oct 2023

    कोई मेरे साथ चले!

    आज एक बार फिर मैं देश के एक श्रेष्ठ कवि और संपादक रहे स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की कुछ कविताएं लंबे समय तक याद रहती हैं| सर्वेश्वर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल…

  • 14th Oct 2023

    दरिया तिरी रवानी को!

    शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को, मैं देखता रहा दरिया तिरी रवानी को| शहरयार

  • 14th Oct 2023

    ख़याल छोड़ चुके क्या!

    ज़मीं ने कर लिया क्या तीरगी से समझौता, ख़याल छोड़ चुके क्या चराग़ जलने का| शहरयार

  • 14th Oct 2023

    नहीं सँभलने का!

    बिगड़ गया जो ये नक़्शा हवस के हाथों से, तो फिर किसी के सँभाले नहीं सँभलने का| शहरयार

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