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मेहँदियों से रचा हुआ!
मुझे हादसों ने सजा सजा के बहुत हसीन बना दिया, मिरा दिल भी जैसे दुल्हन का हाथ हो मेहँदियों से रचा हुआ| बशीर बद्र
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महकते होंटों के चाँद
वही ख़त कि जिस पे जगह जगह दो महकते होंटों के चाँद थे, किसी भूले-बिसरे से ताक़ पर तह-ए-गर्द होगा दबा हुआ| बशीर बद्र
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नदी के पास खड़ा हुआ
कई मील रेत को काट कर कोई मौज फूल खिला गई, कोई पेड़ प्यास से मर रहा है नदी के पास खड़ा हुआ| बशीर बद्र
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यह विलाप नहीं है!
आज एक बार फिर मैं आधुनिक हिन्दी कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| श्री वाजपेयी जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता – यह विलाप नहीं हैएक नीरव प्रार्थना हैजो किसी देवता को…
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आँसुओं से लिखा हुआ!
जिसे ले गई है अभी हवा वो वरक़ था दिल की किताब का, कहीं आँसुओं से मिटा हुआ कहीं आँसुओं से लिखा हुआ| बशीर बद्र
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कहा हुआ न सुना हुआ
कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बँधा हुआ, वो ग़ज़ल का लहजा नया नया न कहा हुआ न सुना हुआ| बशीर बद्र
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वो टूट भी सकती है!
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है, जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है| बशीर बद्र
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जब बर्फ़ पिघलती है!
ख़ुश-रंग परिंदों के लौट आने के दिन आए, बिछड़े हुए मिलते हैं जब बर्फ़ पिघलती है| बशीर बद्र
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आँखों के लिफ़ाफ़ों में!
यूँ प्यार नहीं छुपता पलकों के झुकाने से, आँखों के लिफ़ाफ़ों में तहरीर चमकती है| बशीर बद्र
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यूँ याद तिरी शब भर!
लोबान में चिंगारी जैसे कोई रख जाए, यूँ याद तिरी शब भर सीने में सुलगती है| बशीर बद्र