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21. रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे
जयपुर में रहते हुए ही मैंने हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की एक वैकेंसी देखी, हिंदी अनुवादक के लिए, यह कार्यपालक श्रेणी का पद था, जबकि आकाशवाणी में, मैं पर्यवेक्षकीय स्तर पर था, हालांकि पदनाम वही था। इसके अलावा वेतन में काफी अंतर था। मैंने आवेदन किया और चयन परीक्षा एवं साक्षात्कार के लिए मुझे बुलावा भी…
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20. बहुत दिया देने वाले ने तुझको, आंचल ही न समाए तो क्या कीजे!
जयपुर पहुंच गए लेकिन काफी कुछ पीछे छूट गया। मेरी मां, जिनके लिए हमारा वह पुराना मोहल्ला अपने गांव जैसा था, बल्कि मायका भी था क्योंकि उनके भतीजे- वकील साहब वहीं रहते थे। वो दिल्ली नहीं छोड़ पाईं। एक-दो बार हमारे साथ गईं भी, जहाँ भी हम थे, लेकिन वहाँ नहीं रुक पाईं। एक और…
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19. हम खें जुगनिया बनाय गए अपुन जोगी हो गए राजा
दिल्ली में सरकारी सेवा के दौरान ही मैंने स्टाफ सेलेक्शन कमीशन की एक और परीक्षा दी, जो हिंदी अनुवादक के पद पर चयन के लिए थी। इस परीक्षा में मैं सफल हुआ और उसके आधार पर ही आकाशवाणी, जयपुर में अनुवादक पद के लिए मेरा चयन हुआ। इस परीक्षा के प्रश्न-पत्र का एक प्रश्न मुझे…
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18. भूख मिट नहीं सकती, पेट भर नहीं सकता ज़िंदगी के हाथों में, कौन सा निवाला है
दिल्ली से जाल समेटने से पहले, कुछ और बातें कर लें। वैसे तो रोज़गार की मज़बूरियां हैं वरना कौन दिल्ली की गलियां छोड़कर जाता है। वैसे भी यह तो अतीत की बात है, मैं इसे कैसे बदल सकता हूँ? अगर बदल सकता तो कुछ और बदलता, जो मैं पहले लिख चुका हूँ। कुछ छिटपुट घटनाएं…
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17. लेखनी मिली थी गीतव्रता, प्रार्थना पत्र लिखते बीती
ऐसा लगता है कि कवियों, साहित्यकारों की बात अगर करते रहेंगे तो दिल्ली छोड़कर आगे ही नहीं बढ़ पाएंगे। लेकिन कुछ लोगों की बात तो करनी ही होगी। आज पहले एक गोष्ठी की बात कर लेते हैं, जो दिल्ली में हिंदी साहित्य सम्मेलन कार्यालय में हुई थी। हिंदी साहित्य सम्मेलन का यह कार्यालय उस समय…
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16. घर, शहर, दीवार, सन्नाटा- सबने हमें बांटा
जिस प्रकार लगभग सभी के जीवन में भौतिक और आत्मिक स्तर पर घटनाएं होती हैं, जिनको शेयर करना समीचीन होता है। मैं प्रयास करूंगा कि जहाँ तक मेरी क्षमता है, मैं रुचिकर ढंग से इन घटनाओं को आपके सपने रखूं। इस क्रम में अनेक नगर, व्यक्ति और उल्लेखनीय घटनाएं शामिल होंगी, लेकिन मेरा ऐसा इरादा…
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15. नक्काशी करते हैं नंगे जज़्बातों पर
दिल्ली में उन दिनों तीन-चार ही ठिकाने होते थे मेरे, जिनमें से बेशक उद्योग भवन स्थित मेरा दफ्तर एक है, उसके अलावा शाम के समय दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी या फिर कनॉट प्लेस, जहाँ अनेक साहित्यिक मित्रों से मुलाक़ात होती थी। इसके अलावा जब बुलावा आ जाए तब आकाशवाणी में युववाणी केंद्र, जिसका कार्य…
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14. एक बूढ़ा आदमी है देश में या यूं कहें इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है।
जीवन में कोई कालखंड ऐसा होता है, कि उसमें से किस घटना को पहले संजो लें, समझ में नहीं आता है। अब उस समय को याद कर लेते हैं जब सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार और नाइंसाफी के विरुद्ध जयप्रकाश नारायण जी ने ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन चलाया हुआ था। इस आंदोलन ने पूरे देश को झकझोर…
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13. मंज़िल न दे, चराग न दे, हौसला तो दे
एक नाइंसाफी तो लंबे समय से चलती चली आई है कि इतिहास को राजाओं के शासन काल से बांट दिया गया, बल्कि इतिहास का मतलब सिर्फ इतना हो गया कि किस राजा ने किस समय तक शासन किया, कहाँ जीत-हार हासिल की, कौन से अच्छे-बुरे काम किए। मैंने भी यहाँ अपनी नौकरियों की अवधि के…
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12. सफर दरवेश है ऐ ज़िंदगी….
दिल्ली में रहते हुए मैंने पीताम्बर बुक डिपो और दिल्ली प्रेस में दो प्राइवेट नौकरी की थीं और उसके बाद 6 वर्ष तक उद्योग मंत्रालय में कार्य किया, जिसमें से मैं 3 वर्ष तक संसदीय राजभाषा समिति में डेपुटेशन पर भी रहा। खैर फिलहाल तो दिल्ली प्रेस की ही बात चल रही है। कुछ साहित्यिक…